Monday, September 26, 2016

हरड़ के अद्भुत गुण

हरीतकी (हरड़) सदा ही पथ्यरूपा (जिसका कभी परहेज ना करना पड़े) है, माता के समान हित करने वाली है। माता कभी-कभी कोप कर सकती है किन्तु सेवन की गयी हरड़ कभी कुपित, सदा हित ही करती है।

हरड़ एक दिव्य औषधि है, जो सदियों से इस्तेमाल में लायी जा रही है। जिसे संस्कृत में ‘हरीतकी’ भी कहा जाता है। हरड़ दो प्रकार की होती है, छोटी और बड़ी हरड़ जिसका पेड़ सीधा और तना हुआ होता है। अगर इसके रंग और स्वाद की बात की जाये, तो यह काले और पीले रंग का होता है, जिसका स्वाद खट्टा और मीठा रहता है।
हरड़ के 32 अद्भुत गुण :
1.नमक के साथ हरड़ खाने से पेट सदा साफ रहता है। हरड़ के चूर्ण में एक चौथाई भाग ही नमक मिलाना चाहिए इससे अधिक में दस्तावर हो सकता है।
2.घी के साथ हरड़ का चूर्ण चाटने से कभी हृदय रोग नहीं होता।
3.सुबह शहद के साथ हरड़ का चूर्ण चाटने से शरीर का बल और शक्ति बढ़ती है।
4.मक्खन-मिस्री के साथ हरड़ के चूर्ण का सेवन करने से स्मरण शक्ति और बुद्धि बढ़ती है अतः विद्यार्थियों का इसका सेवन अवश्य करना चाहिए।
5.पंचगव्य के साथ हरड़ का चूर्ण सेवन करने से आयु बढ़ती है।
6.इसके सेवन से कई छोटी से बड़ी बीमारी जड़ से खत्म हो जाती है, यह दिमाग को तेज रखने में और आँखों के लिए सबसे गुणकारी औषधि है, जो शरीर को ताकत प्रदान कर निरोगी बनाती है। सिर्फ यही नहीं यह हमारे शरीर को कब्ज से छुटकारा दिलवाने में भी मददगार साबित हुई है। तो आज से ही इसका सेवन शुरू करे, इसका चूर्ण और गोलियां आसानी से मार्केट में मिल जाती है।
7.हरड़ के एनिमा से अल्सेरिक कोलाइटिस जैसे रोग भी ठीक हो जाते हैं। इन सभी रोगों के उपचार के लिए हरड़ के चूर्ण की तीन से चार ग्राम मात्रा का दिन में दो-तीन बार सेवन जरूर करना चाहिए। कब्ज के इलाज के लिए हरड़ को पीसकर पाउडर बनाकर या घी में सेकी हुई हरड़ की डेढ़ से तीन ग्राम मात्रा में शहद या सैंधे नमक में मिलाकर देना चाहिए।
8.हरड़ लीवर, स्पलीन बढ़ने तथा उदरस्थ कृमि जैसे रोगों के इलाज के लिए लगभग दो सप्ताह तक लगभग तीन ग्राम हरड़ के चूर्ण का सेवन करना ही चाहिए। हरड़ हमारे लिए बहुत उपयोगी है परन्तु फिर भी कमजोर शरीर वाले व्यक्ति, अवसादग्रस्त व्यक्ति या फिर गर्भवती स्त्रियों को इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए।
9.नेत्र रोगो से मुक्ति : हरड़ नेत्र के लिए सबसे फायदेमंद होती है, इसका सेवन करने के लिए पहले हरड़ को भुनले, फिर बारीक़ पीस लेने के बाद इसका अच्छी तरह से लेप बनाकर के आँखों के चारो और लगा ले। ऐसा करने से आँखों की सूजन और जलन जैसी परेशानिया दूर होती है।
10.कब्ज के लिए : बवासीर और कब्ज के लिए हरड़ का चूर्ण बहुत ही लाभकारी होता है। इसके लिए हरड़ में थोड़ा सा गुड मिलाकर गोली बना ले, छाछ में भुना हुआ जीरा मिलाकर ताजी छाछ के साथ सुबह शाम लेने से बवासीर के मस्सों का दर्द और सूजन कम होने लगती है।
11.नवजात शिशु के लिए : अगर नवजात शिशु के भौहें नहीं हो, तो उन्हें हरड़ को लोहे पे घिसकर, सरसो के तेल के साथ मिलाकर शिशु के भौहें पर लगाये और धीरे-धीरे मालिश करते रहने से वह उगने लगते है। इसके साथ ही एक सप्ताह तक बच्चो को हरड़ पीसकर खिलाये जाने से उससे कब्ज की शिकायत नहीं होगी।
12.दमा में राहत : यदि जिन लोगो को दमे की परेशानी है, तो वो रात के समय में हरड़ को चूसे या आवलें के रस में हरड़ मिलाकर सेवन करने से भी इस बीमारी से राहत मिलती है।
13.अपच की शिकायत : हरड़ का सेवन पाचन क्रिया को सही रखने में असरदारी होता है, इसके लिए खाना खाने से पहले हरड़ के चूर्ण में सोंठ का चूर्ण मिलाकर साथ लेने से भूक आसानी से खुल जाती है, और भूक लगने लगती है। इसके साथ ही सोंठ, गुड़ या सेंधा नमक मिलाकर खाने से भी पाचन सही रहता है।
14.चक्कर आना : अगर आपको अचानक चक्कर आने की शिकायत है, तो पीपल (जिसे गरम मसाले मे मिलाते है), सौंठ यानि सुखी अदरक, सौंफ और हरड़ 25-25 ग्राम लेले। अब 150 ग्राम गुड में इन सभी को मिलाकर गोल आकार की गोली बनाए। 1-2 गोली दिन मे 3 बार लेने से चक्कर आना, सिर घूमना बंद हो जाएगा।
15.हरड़ का सेवन लगातार करने से शरीर में थकान महसूस नहीं होती और स्फूर्ति बनी रहती है।
16.हरड़ के टुकड़ों को चबाकर खाने से भूख बढ़ती है।
17.हरड़ के सेवन से खांसी व कब्ज जैसे रोग भी दूर हो जाते हैं।
18.हरड़ को पीसकर उसमे शहद मिलाकर चाटने से उल्टी आना बंद हो जाती है।अगर शरीर में कही भी घाव हो जांए तो हरड़ से उस घाव को भर लेना चाहिए।
19.एक चम्मच हरड़ के चूर्ण में दो किशमिश के साथ लेने से एसिडिटी ठीक हो जाती है।
20.हिचकी आने पर हरड़ पाउडर व अंजीर के पाउडर को गुनगुने पानी के साथ लेने से लाभ होता है।
21.छोटी हरड़ को पानी में भिगो दें। रात को खाना खाने के बाद चबा चबा कर खाने से पेट साफ़ हो जाता है और गैस की समस्या कम हो जाती है।
22.हरड़ को भून कर खूब बारीक पीस लें और लेप बना कर आंखों के चारो ओर लगाएं। इससे हर प्रकार के नेत्र रोग ठीक हो जाते हैं।
23.हरड़ का काढ़ा त्वचा संबंधी एलर्जी में लाभकारी है।
24.हरड़ के फल को पानी में उबालकर काढ़ा बनाएं और इसका सेवन दिन में दो बार नियमित रूप से करने पर जल्द आराम मिलता है।
25.एलर्जी से प्रभावित भाग की धुलाई भी इस काढ़े से की जा सकती है।
26.फंगल एलर्जी या संक्रमण होने पर हरड़ के फल और हल्दी से तैयार लेप प्रभावित भाग पर दिन में दो बार लगाएं, त्वचा के पूरी तरह सामान्य होने तक इस लेप का इस्तेमाल जारी रखें।
27.मुंह में सूजन होने पर हरड़ के गरारे करने से फायदा मिलता है।
28.हरड़ का लेप पतले छाछ के साथ मिलाकर गरारे करने से मसूढ़ों की सूजन में भी आराम मिलता है।
29.हरड़ का चूर्ण दुखते दांत पर लगाने से भी तकलीफ कम होती है।
30.हरड़ स्वास्थ्यवर्धक टॉनिक होता है जिसके प्रयोग से बाल काले, चमकीले और आकर्षक दिखते हैं।
31.हरड़ के फल को नारियल तेल में उबालकर (हरड़ पूरी तरह घुलने तक) लेप बनाएं और इसे बालों में लगाएं या फिर प्रतिदिन 3-5 ग्राम हरड़ पावडर एक गिलास पानी के साथ सेवन करें।
32.हरड़ का पल्प कब्ज से राहत दिलाने में भी गुणकारी होता है। इस पल्प को चुटकीभर नमक के साथ खाएं या फिर 1/2 ग्राम लौंग अथवा दालचीनी के साथ इसका सेवन करें।




कपूर तेल

कपूर तेल (Camphor Oil) :कपूर का प्रयोग हर घर में पूजा-पाठ के लिये किया जाता है। कपूर या फिर कपूर का तेल बालों तथा त्वचा के रोगों के लिये काफी अच्छा माना जाता है। यह जले कटे निशान को भी ठीक करता है। आयुर्वेदा में भी कपूर के तेल का प्रयोग काफी ज्यादा किया जाता है। कपूर घर में आसानी से पाया जाता है इसलिये आप इसे आराम से प्रयोग कर सकती हैं। पुरानी जोड़ों और दर्द से छुटकारा दिलाने के लिए कपूर उपयोगी औषधि है।

कपूर का तेल बनाने की विधि :कपूर का तेल बनाना बहुत आसान है। वैसे तो यह बाजार में कैंफर ऑयल के नाम से बिकता ही है, लेकिन आप घर पर ही इसे तैयार करना चाहते हैं तो नारियल तेल में कपूर के टुकड़े डालकर एक एयर टाइट डिब्बे में बंद कर दें।
आइये जानते हैं कपूर का बहुमूल्य प्रयोग और उसके फायदों के बारे में :
1.मुंहासे रोके : 
एक्ने, पिंपल और फिर उनके दाग, काफी आम सी समस्या है। कपूर का तेल चेहरे पर लगाने से मुंहासों में कमी आती है तथा उनके दाग भी धीरे धीरे कम होने लगते हैं। इसके अलावा कपूर हर तरह के त्वचा रोग को ठीक करने में भी मदद करता है। 
2.घाव और जलन के निशान मिटाए : अगर हाथा आग से जल गया है या फिर उस पर खरोच आदि आ गई है तो भी कपूर सहायक है। थोड़ा सा कपूर थोड़े से पानी में मिला कर प्रभावित स्थान पर लगा लें। ऐसा कुछ दिनों के लिये करें और देखें कि दाग कैसे गायब हो जाता है।
3.फटी एड़ियों के लिये : कपूर फटी एडियों की दरार को मुलायम बना कर उन्हें भर देता है। गरम पानी में थोड़ा सा कपूर डाल कर, उसमें पैर भिगोने के बाद स्क्रब करें और ऐसा ही कुछ दिनों तक करें। इसके बाद एडियों पर अच्छी क्रीम लगा लें।
4.स्किन रैश और लालिमा दूर करे : अगर आपकी त्वचा पर हर दिन लाल रंग के चकत्ते दिखाई देते हैं, तो उसे ठीक करने के लिये कपूर को थोड़े से पानी में मिला कर पेस्ट बनाएं और प्रभावित स्थान पर लगाएं। ऐसा कई दिनों तक करें। धीरे धीरे आपको रिजल्ट दिखने लगेगा।
5.बालों के लिये : कपूर बालों के लिये भी अच्छा माना जाता है। कपूर के तेल को सुगन्धित तेल के साथ मिक्स कर के सिर पर लगाने से बाल दुबारा उग आते हैं और तवान भी कम हो जाता है। यह बालों को जड़ से मजबूत बनाता है। आप चाहें तो तेल में अंडा या दही मिला कर सिर में लगा सकती हैं, फिर एक घंटे के बाद बालों को धो सकती हैं।
6.बालों को झड़ने से रोके : कपूर के तेल से नियमित रूप से सिर की मसाज करने से बालों का झड़ना रूक जाता है।

Thursday, September 22, 2016

शरीर को मोटा ताजा करने वाला अनभूत नुस्खा


आंवला 100 ग्राम ,
अश्वगंधा 100 ग्राम
गिलोय 100 ग्राम 
सफेद मूसली 100 ग्राम ,
गोखरू 100 ग्राम,
शतावर 100 ग्राम,
ताल मखाना बीज 100 ग्राम
सफेद तिल 100 ग्राम,
त्रिकुटा 100 ग्राम ,
Alo 50 ग्राम,
वंश लोचन 100 gm
इन सब औष्धियो तो जड़ी _ बूटी बेचने वालों से लाकर साफ करके सुखा कर कूट कर कपड़छान करलें [ कपड़छान मलमल के कपडें में करें
कपड़छान करने पर खुले मुँह के बर्तन में डालकर आँवले के रस मे भिगोकर घोटें , ऐसा सात बार करें []
[ आयुर्वेद की भाषा में कहा जाए तो सब दवाओ को , आँवले के रस की सात भावना देकर सुखा लें ][]
इसके बाद अशगंध की सात भावना दें |
इसके बाद विदारीकंद के ताजे रस की भावना दें |
इसके बाद सिंम्बल मूसली की सात भावना दें |
सब दवा को सुखाकर फिर इसमें .....
20 ग्राम मुक्ता भस्म [ अच्छी कंपनी की लें ]
रजत_भस्म या वर्क १० ग्राम
लौह भस्म 50 ग्राम साधारण या 100 putti
दवा ताकतवर हो जाती है , रक्त में वृदि बहुत करती है , शरीर लोहा बना देती है | ]
अभ्रक भस्म 50 ग्राम साधारण या 100 puti
इससे दवा के गुणो मे वृदि होती है , फेफडो़ को ताकत देती है , मानसिक कमजोरी दूर करती है
अति विशवास योग कंपनी की भस्में ही प्रयोग करे , रेट पर न जाएं , बस शर्त यह है कि चीज अच्छी मिल जाए लेकिन महंगी चाहे आम से दस गुणा ही क्यो न हो |
सब भस्मो को मिलाकर रख लें |
सारी दवा के बराबर मिश्री डालकर ऱख लें |
सुबह - शाम दूध के साथ लें |
फायदे :- कद लंबा , वीर्य की कमी , शरीर का पतलापन , कमजोरी आदि में लाभकारी है |
आप सभी basme डाबर बैद्यनाथ झंडू व्यास फार्मास्यूटिकल आदि किसी भी कंपनी की ले सकते हैं

नीम का तेल

नीम का तेल जोकि गंध व स्वाद में कड़वा होता है प्रथम श्रेणी की कीटाणुनाशक होता है।

- यह चर्म रोगों में लाभदायक है.
- यह गर्भ निरोधक के रूप में काम आता है .
- दांतों और मसूड़ों की समस्या में इसके तेल की कुछ बूंदों मंजन में मिला कर मले.
- कील-मुंहासों के लिए नीम का तेल लगाने से भी लाभ होता है। चेचक के दाग दूर करने के लिए नीम की निबोली का तेल आराम देता है।
- गंजेपन की समस्या है तो सिर में नीम का तेल लगाएं। इससे जूएं-लीखें भी दूर हो जाती हैं।
- बालों को चमकदार, स्वस्थ बाल के लिए,सूखापन दूर करने के लिए कारगर हे। समय से पहले सफ़ेद होने से रोकता है और यहां तक कि बालों के झड़ने के लिए कुछ हद तक मदद कर सकता हैं।
- यह नाखून में स्निग्धता बनाता है, और भंगुर नाखून(टूटने और विकृत होने की समस्या) को हटा कर उन्हें नया-सुन्दर वर्ण प्रदान करता हे।इससे नाखून के कवक(फंगल) से छुटकारा मिल जाता है।
- नीम तेल एक जैविक कीटनाशक के रूप में काम करता है: इससे "यह 'कीड़े हार्मोनल संतुलन को बाधित किये बिना मर जाते हैं।नीम तेल स्प्रे भी एक कीट रिपेलेंट के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. नीम मच्छरों को दूर रखता है और यह आपकी त्वचा के लिए अच्छा है.
- किसानों के लिए यह जैविक कीटनाशक का काम करता है. यह पर्यावरण हितैषी है. यह जमीन या पानी की आपूर्ति में कोई हानिकारक पदार्थ नहीं मिलाता .यह बायोडीग्रेडेबल है. यह मधुमक्खियों और केंचुए के रूप में उपयोगी कीड़े को नुकसान नहीं पहुंचाता .
- जोड़ों में दर्द हो तो नीम के तेल की मालिश से लाभ होता है.
- फीलपांव के रोगी को 5 से 10 बूंद नीम का तेल प्रतिदिन 2 बार सेवन करना चाहिए।
- जलने की वजह से शरीर में जख्म बन जाने पर नीम का तेल लगाने से जख्म जल्दी ठीक हो जाते हैं। जीवाणुओं के संक्रमण (फैलने) से भी सुरक्षा होती है।
- आधा चम्मच नीम का तेल दूध में मिलाकर सुबह-शाम को पीने से रक्तप्रदर और सभी प्रकार के प्रदर निश्चित रूप से बन्द हो जाता है।
- नीम के तेल को लगाने से कान की फुंसिया ठीक हो जाती हैं। अगर फुंसियों में जलन भी हो तो नीम के तेल के बराबर ही तिल का तेल मिलाकर फुंसियों पर लगाने से आराम आता है। कान के दर्द और कान बहने में भी नीम का तेल लगाने से लाभ होता है.
- नीम का तेल और शहद बराबर लेकर मिला लें, फिर इसकी 2-2 बूंदे रोजाना 1 से 2 महीने तक कान में डालने से कान के बहने में लाभ मिलता है।
- नीम के तेल में चालमोंगरे का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर शीशी में भरकर रख लें। इस तेल को सफेद दागों पर लगा लें और 5 से 6 बूंद बताशे में डालकर खा लें।
- नीम के तेल को सूंघने मात्र से बाल काले हो जाते हैं। इसकी २ बूँद नाक में डाले .
- नीम के तेल की मालिश करने से सिर के दर्द में आराम आता है।
- नीम तेल और सरसों तेल में थोड़ा कपूर मिला ले. इसका दिया जलाने से कीड़े और मच्छर दूर रहते है.

Tuesday, September 20, 2016

बुखार के लिए ब्रह्मास्त्र उपचार


सभी प्रकार के बुखार के लिए ब्रह्मास्त्र उपचार -
जैसे -
@ #डेंगू
@ #मलेरिया
@ #टाइफाइड
@ #माता निकलना छोटी /बड़ी /चेचक
@ #दिमागी बुखार
@ #वायरल बुखार
@ #चिकनगुनिया
व
अन्य सभी प्रकार के बुखार का उपचार
20 पत्ते #तुलसी (निशुल्क)
10 ग्राम #सोंठ। (पंसारी से मिले गा)
10 ग्राम #छोटी #पीपल (पंसारी से मिले गा)
5 ग्राम नीम #गिलोए का पाउडर (ताजा भी ले सकते 4 इंच की बेल)(निःशुल्क/पंसारी से पाउडर मिले गा)
उपरोक्त को 1 ग्लास पानी में धीमी आँच पर पकाए
आधा बचने पर सेवन करे
इस काढ़े को दिन में 3 बार बना कर पिए
बच्चो के 15 15 ml
10 से 15 के लिए 25 25 ml
वयस्क के लिए 50 50 ml या अपने चिकित्सक के परामर्श से लीजिये
या
हरसिंगार के 7 पत्तो का काढ़ा बना कर सुबह शाम पिए
हरिद्वार में जो भाई बहन रहता है उसे निःशुल्क उपलब्ध करवा दूंगा हरसिंगार के पत्ते
हरे रंग के खुरदरे होते है सफेद फूल आते है
ये गठिया का भी रामबाण उपचार है
प्लेटलेट्स कम हो जाए तो
@अनार का जूस
@पपीते के पत्तो का जूस
@गिलोए का काढ़ा पिलाए

पुरुषों के लिए बेहद फायदेमंद हैं अखरोट

अखरोट से आप इसके विभिन्न गुणों के कारण परिचित होंगे ,लेकिन आज आपको हम यू. सी.एल.ए. के वैज्ञानिकों की एक नयी रिसर्च के बारे में बताते हैं। इस रिसर्च के अनुसार अगर 75 ग्राम की मात्रा में अखरोट का सेवन रोजाना किया जाए तो यह शुक्राणुओं को शक्ति ,ऊर्जा और गति प्रदान करता है।
अखरोट का यह प्रभाव विशेष रूप से 21 से 25 वर्ष की आयु वर्ग में पाया गया है। यूनिवर्सिटी ऑफ केलीफोर्निया में कार्यरत वैज्ञानिक डॉ.विंडी राबिन्स और उनकी टीम द्वारा किये गए शोध के अनुसार अखरोट को पालीअन्सेचुरेटेड फेटी एसिड्स का प्रमुख सोर्स माना गया है और इसमें विशेष प्रकार ओमेगा -3 फेटी एसिड एल्फो लिनोलीक एसिड पाया जाता है।
21 से 35 आयु वर्ग के 117 स्वस्थ व्यक्तियों में कराये गए अध्ययन में लोगों को दो समूह में बांटा गया। 58 पुरुषों को किसी प्रकार के बादाम या अखरोट रहित आहार का सेवन कराया गया जबकि 59 पुरुष नियमित 75 ग्राम अखरोट खिलाया गया। इस शोध से पूर्व सभी के सीमन का परीक्षण किया गया और पुन: शोध के 12 वें सप्ताह में इसे दुबारा देखा गया।
इस शोध में यह पाया गया कि दोनों समूह के शरीर के बाडी मास इंडेक्स,वजन एवं सक्रियता के स्तर में कुछ खास फर्क नहीं पड़ा,लेकिन जिस समूह को 75 ग्राम की मात्रा में नियमित अखरोट दिया गया था, उनके सीमेन स्थित शुक्राणुओं में गजब का सकारात्मक प्रभाव देखा गया और इससे यह पाया गया निष्कर्ष मिला कि 75 ग्राम नियमित अखरोट का सेवन शक्राणुओं को ऊर्जा,शक्ति एवं सक्रिय बनाता है।

खजूर रोगों का रामबाण उपाय

खजूर फल पौष्टिक तत्वों का बहुत बड़ा खजाना होता है । यह शरीर की सप्त धातुओं की पुष्टि करके शरीर को फौलाद की तरह बनाने में सक्षम होता है । इसके बारे में एक तथ्य यह भी है की खजूर का पेड़ जितना बड़ा होता है इसके फल उतने ही छोटे होते हैं । मूल रूप से यह अरब देशों में पाया जाता है और अपने स्वाद और गुणों के कारण आज सम्पूर्ण विश्व में समान रूप से पाया जाता है । खजूर को ही सुखाकर छुहारा बनाया जाता है.
 खजूर में पाये जाने वाले पोषक तत्वों में फाईबर, विटामिन ए, बी-कॉम्प्लेक्स, विटामिन के, ऑयरन, कॉपर, मैगनीशियम, मैगनीज़ आदि पाये जाते हैं ।

1.कब्ज़ में स्थाई आराम : कब्ज़ का मुख्य कारण होता है आँत में खुश्की होना और खजूर आँतों की खुश्की को पूरी तरह से खत्म करता है । खजूर के द्वारा कब्ज़ को पूरी तरह खत्म करने के लिये रोज सुबह दो-तीन खजूर को एक कटोरी ताजे पानी में डुबोकर रख दीजिये और रात होने तक रखा रहने दीजिये । रात को सोते समय इन खजूरों को खूब चबा चबा कर खा लीजिये । यह प्रयोग 7-15 दिनों तक लगातार कीजिये ।
2.वजन बढ़ानें में लाभकारी : खजूर में सभी पोषक तत्व तो पाये ही जाते हैं इसके अतिरिक्त यह कैलोरी और ग्लुकोज़ का भी बहुत अच्छा स्रोत है जिस कारण से यह दुबले-पतले लोगों में वजन बढ़ाने का काम कर सकता है । वजन बढ़ाने का लाभ उठाने के लिये14 साल से अधिक उम्र के लोग रोज पूरे दिन में 10-12खजूर खूब चबा चबा कर खायें ।
3.ऊर्जा देता है : खजूर में शरीर को तुरंत ऊर्जा देने की प्राकृतिक शक्ति होती है क्योंकि इसमें शुगर अधिक मात्रा में पायी जाती है । यह शुगर ग्लुकोज़ और फ्रक्टोज़ दोनों ही रूप में उप्लब्ध होती है । इस कारण से जब भी शरीर को अधिक ऊर्जा की जरूरत हो तो 2-3 खजूर खाकर ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है।
4.नाड़ीतंत्र को मजबूत करे : शरीर का नाड़ीतंत्र सबसे ज्यादा उलझे हुये तंत्रों में माना जाता है । सम्पूर्ण शरीरेंद्रियों का मस्तिष्क के साथ सम्पर्क मुख्यतः नाड़ीतंत्र के द्वारा ही सम्भव हो पाता है । खजूर नाड़ीतंत्र का परम मित्र सिद्ध होता है । खजूर में उपलब्ध पोटाशियम नाड़ीतंत्र के लिये बहुत जरूरी होता है । साथ ही साथ यह रक्त्चाप को नियमित रखता है और हृदय को भी मजबूत करता है ।
5.खून की कमी दूर करे : खजूर में शरीर के लिये लाभकारी और शरीर द्वारा आसानी से स्वीकार किया जाने वाला ऑयरन तत्व पाया जाता है । अतः खून की कमी से परेशान लोगों के लिये खजूर वास्तव में किसी वरदान से कम नही है । रक्ताल्प्तता के रोगियों के लिये रोज दो बार 2-2खजूर खाना पर्याप्त होता है ।
इन सबके अलावा खजूर से तैयार होने वाले कुछ प्रमुख घरेलू नुस्खे निम्न लिखित हैं :
1.– प्रतिदिन खजूर खाने और साथ में दूध पीने से शरीर को भरपूर शक्ति मिलती है । खजूर के सेवन से वीर्य की वृद्धि होती है ।
2.– दो खजूर को दूध में उबालकर ख्हने से और साथ में वही दूध पीने से शरीर में शक्ति का संचार होता है ।
3.– हृदय रोगी यदि 4-5 खजूर रोज खायें तो यह उनकी रक्तवाहीनियों में रक्त का संचार सरल होता है जिससे रक्तसंचार के अवरोध होने से हृदय रोग की भावना नष्ट होती है।
4.– 2 खजूर को जल में उबाल कर, उसमें 2-3 ग्राम मेथी दाना का चूर्ण मिलाकर रोज खाने से महिलाओं का कमर का दर्द जल्दी ही ठीक हो जाता है ।
5.– खजूर को काली मिर्च के चूर्ण के साथ दूध में उबाल कर पीने से पुराना सूखा नजला ठीक होता है ।
6.– खजूर, मिश्री, मक्खन मिलाकर गरम दूध के साथ खाने से सूखी खाँसी ठीक होती है ।
7.– पाँच-सात खजूर रात भर पानी में भिगोकर सुबह उनकी गुठली निकालकर, गूदे को शहद के साथ खाने से लीवर और तिल्ली बढ़ने के रोग खत्म होते हैं ।
विशेष नोट :- खजूर बहुत ही मीठा होता है जिस कारण से यह शरीर में खून की शुगर के स्तर को एक दम से बढ़ाता है । अतः मधुमेह के रोगियों को खजूर का सेवन नही करना चाहिये। ऐसे रोगी यदि खजूर खाना ही चाहते हैं तो पहले अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें।

Friday, September 9, 2016

उत्तेजना लाने और स्तम्भन शक्ति बढ़ाने के लिए। Sex Power


आज कल की जीवन शैली, खान पान, अत्यधिक मैथुन और दवाओ के सेवन से कमज़ोर हो चुकी यौन शक्ति में उत्तेजना और स्तम्भन शक्ति बढ़ाने के लिए ये उपचार बहुत सहायक और आसान हैं। आइये जाने।

* एक लौंग को चबाकर उसकी लार को लिंग के पिछले भाग पर लगाने से संभोग करने की शक्ति तेज हो जाती है।
* बकरी के घी को लिंग पर लगाने से लिंग मजबूत होता है और उसमें उत्तेजना आती है।
* धतूरा, कपूर, शहद और पारे को बराबर मात्रा में मिलाकर इसके लेप को लिंग के आगे के भाग (सुपारी) को छोड़कर बाकी भाग पर लेप करने से संभोग शक्ति तेज हो जाती है।
* हीरा हींग को शुद्ध शहद में मिलाकर लिंग पर लेप करने से शीघ्रपतन का रोग जल्दी दूर हो जाता है। लिंग पर इस मलहम अर्थात लेप को लगाने के बाद शीघ्रपतन से ग्रस्त रोगी अपनी मर्जी से स्त्री के साथ संभोग करने का समय बढ़ा सकता है।
* 10 ग्राम दालचीनी का तेल और 30 ग्राम जैतून के तेल को एक साथ मिलाकर फिर इस तेल की कुछ बूंदों को लिंग पर लेप करते रहने से शीघ्रपतन की शिकायत दूर हो जाती है, संभोग करने की शक्ति बढ़ती है। इस क्रिया के दौरान लिंग को ठंडे पानी से बचाना चाहिए।
* काले धतूरे की पत्तियों के रस को टखनों पर लगाकर सूखने के बाद संभोग करने से संभोग क्रिया पूरी तरह से और संतुष्टि के साथ संपन्न होती है।

पुरुषो के लिए विशेष उरद के लड्डू ,

उरद दाल पुरुषो के लिए किसी वरदान से कम नहीं। उरद को मर्दाना ताक़त और कमज़ोरी दूर करने के लिए अक्सर ही इस्तेमाल किया जाता रहा हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं उरद को इस्तेमाल करने का विशेष तरीका, इसके लड्डू बना कर। तो मज़े से खाइये और कमज़ोरी दूर भगाइए।

 आवश्यक सामग्री:-
उरद दाल – 400 ग्राम
घी – 400 ग्राम
बूरा या पिसी मिश्री – 300 – 400 ग्राम
काजू, किशमिश, बादाम – 100 ग्राम(सभी मिला कर वजन )
पिस्ते – एक टेबल स्पून (लगभग दस ग्राम )
छोटी इलाइची – 10 नग

बनाने की विधि:-

सबसे पहले उरद दाल को साफ कीजिये फिर धोइये और 3-4 घंटे के लिये पीने के पानी में भिगो दीजिये- दाल से अतिरिक्त पानी निकालिये और दाल को हल्का मोटा पीस लीजिये और अब कढ़ाई में आधा घी डालिये और दाल को लगातार चमचे से चलाते हुये भूनिये बचा हुआ घी पिघला कर रखिये और चमचे से थोड़ा थोड़ा डाल कर दाल को चमचे से चलाते हुये लगातार ब्राउन होने तक भून लीजिये-और काजू, बादाम को छोटा छोटा काट लीजिये, किशमिश को डंठल तोड़ कर साफ कर लीजिये, पिस्ते को बारीक कतर लीजिये. इलाइची छील कर कूट लीजिये.फिर भुनी हुई दाल में बूरा, मेवा और इलाइची डाल कर अच्छी तरह मिला लीजिये. लड्डू बनाने के लिये मिश्रण तैयार है।
मिश्रण को थोड़ा थोड़ा हाथ में लीजिये और दबा दबा कर अपने मन पसन्द आकार के लड्डू बना कर थाली में रखिये-सारे मिश्रण से लड्डू बना कर थाली में रख लीजिये- उरद दाल के लड्डू तैयार हैं. लड्डू को एअर टाइट कन्टेनर में भर कर रख लीजिये और महिने से भी ज्यादा दिनों तक लड्डू कन्टेनर से निकाल कर खाइये।

फायदे।

एक लड्डू सुबह -सुबह खा कर एक गिलास दूध का सेवन करने से कमजोरी जाती रहती है इससे नामर्दी नपुंसकता ,स्वप्नदोष जेसी बीमारियों में लाभ मिलता है।

स्वपन दोष के कारण और निवारण



सोते समय वीर्य के निकल जाने को स्वपनदोष कहते है.  युवावस्था में स्वपनदोष होना एक आम बात है, सोने के बाद स्वतः ही वीर्यपात हो जाने को स्वपनदोष के नाम से जाना जाता है. सपने में किसी से काम-सम्बन्ध बनाते हुए वीर्य स्खलन हो जाता है. बिना किसी स्वप्न के भी स्वप्न दोष होना भी एक आम बात है जिसका कारण होता है तंग वस्त्र पहनना, रात को पेट भर कर खाना, गर्म दूध पी कर सोना, अधिक मात्रा में आम या पपीता या ऐसे गर्म फल खा कर सोना इत्यादि. ऐसे में गर्म प्रकृति की चीजें, तेल, मसाले, अंडे आदि का सेवन बंद कर दें इससे लाभ मिलता है. कुछ युवा स्वपन दोष से मानसिक उत्कुंठा से ग्रसित हो जाते हैं, इसकी बजाये उनको इस पर ज्यादा ध्यान ना देते हुए प्रसन्न रहना चाहिए, और हलकी कसरत और योग और ध्यान करना चाहिए. वैसे तो स्वप्नदोष की बीमारी विवाह पश्चात् लगभग समाप्त हो जाती है, लेकिन फिर भी समस्या रहे तो इलाज अवश्य ही करना चाहिए.

स्वपनदोष के कारण

  • अश्लीन साहित्य पढना.
  • सहवास के बारे में अत्यधिक रूचि रखना या स्त्री संग क्रिया के बारे में हमेशा सोचना.
  • खाना-पीना सोने के ठीक पहले करना या देर रात्रि में भोजन-पानी करना.
  • पेट के बल सोना या उलटे होकर सोना
  • कब्ज होना या पेट गर्म होना
  • पेट भर कर या ज्यादा खाना
  • रात्रि को गर्म दूध पीकर सोना
  • रात्रि में पपीता या आम अधिक खा कर सोना
  • तंग वस्त्र पहन कर सोना.
  • रात्री में पेशाब को रोक कर रखना

स्वपन दोष में सावधानी

  • यह एक मानसिक बीमारी है, अतः मन को पवित्र रखें.
  • ठंडे पानी से नहायें.
  • रात्रि को गर्म दुध न पीयें.
  • रात्रि को सोने से पूर्व अपने पांव घुटनों तक ठंडे पानी से धोकर सोवें.
  • उत्तेजना पैदा करने वाले साहित्य को न पढ़े.
  • सोने से तीन घंटे पहले खाना-पीना आदि कर ले.
  • हमेशा सीधे या करवट ले कर ही सोने की कोशिश करे.
  • सोते समय कोई अच्छी पुस्तक पढ़ सकते है, जिससे सोते समय केवल अच्छे विचार ही मष्तिष्क में रहें.
  • नियमित त्रिबंध प्राणायाम, योगासन, ब्रह्ममुहूर्त में उठने से लाभ मिलता है.
  • कब्ज न होने देवें.
  • गुप्तांग के आसपास के बालों को बढ़ने न दिया जाये.
  • रात्रि को खाना खाने के बाद पेशाब जरुर करना चाहिए.
  • गुप्तांग की चमड़ी को पीछे हटाकर रोजाना साफ़ करना चाहिए.

स्वपन दोष के घरेलु उपचार.

  • आंवला और मिश्री दोनों को संभाग ले कर चूर्ण बना कर रख लीजिये, सुबह शाम एक एक चम्मच सादे पानी से इसका सेवन करें. इस से वीर्य गाढ़ा होता है और स्वपन दोष नहीं होता.
  • लहसुन की दो कली कुचल कर निगल जायें। थोड़ी देर बाद गाजर का रस पीलें।
  • आंवले का मुरब्बा रोज खायें ऊपर से गाजर का रस पियें।
  • पके बेल का गूदा 10ग्राम, भांग 1ग्राम, धनिया 10 ग्राम व सौफ5ग्राम सबको एक ग्लास गाजर के रस में भिगा दें। सबको घोटकर पी जाये। कुछ दिन लगातार पियें।
  • तुलसी की जड़ के टुकड़े को पीसकर पानी के साथ पी जायें। अगर जड़ न मिले तो बीज 2 चम्मच शाम के समय लें।
  • काली तुलसी के पत्ते 10-12 रात में जल के साथ लें।
  • मुलहटी चूरण आधा चम्मच, आक की छाल का चूरण एक चम्मच दूध के साथ लें।
  • अदरक रस 2 चम्मच, प्याज रस 3 चम्मच, शहद 2 चम्मच, गाय का घी 2 चम्मच, सबको मिलाकर चाटें स्वप्न दोष तो ठीक होगा ही साथ मर्दाना ताकत भी बढ़ती है।
  • रात को एक लीटर पानी में त्रिफला चूर्ण भिगा दें सुबह मथकर महीन कपड़े से छानकर पी जायें।
  • सुबह नहाते समय पेट, पीठ, पैर के पंजे पर पानी की धार डालें।
  • रात को सोते समय हाथ पैर को धोकर सोयें।
  • नीम की 5 पत्तियाँ नित्य चबाकर खाते रहने से स्वप्नदोष जड़ से गायब हो जाएगा। जब स्वपन दोष की बीमारी हट जाए तो नीम के पत्तो का सेवन अधिक नहीं करना चाहिए.

स्वपन दोष का विशेष नुस्खा.

शुष्क धनिया ( दाना ) को मोटा-मोटा कूटकर छिलका अलग करें और बीजोके अंदर की गिरी निकालकर 300 ग्राम धनिया की गिरी ( प्राय: 450 ग्राम धनिया में से 300 ग्राम गिरी निकल जाती है ) तथा बराबर वजन 300 ग्राम कुंजा मिश्री  ( या चीनी ) ले। दोनों को अलग-अलग पीसकर आपस में मिला ले। बस, दवा तैयार। आयुर्वेद में चीनी का मतलब देशी चीनी से होता हैं जो पाउडर की तरह होती हैं। दानेदार चीनी ज़हर के समान हैं।

सेवन विधि

प्रात: सायं छ: छ: ग्राम की मात्रा से यह चूर्ण बासी पानी के साथ दिन में दो बार ले। प्रात: बिना खाए-पिए रात को बासी पानी से छ: ग्राम फांक ले और तत्प्श्चात एक-दो घंटे तक और कुछ न खाएं। इसी प्रकार छ: ग्राम दवा शाम 4 बजे लगभग प्रात: के रखे हुए पानी के साथ फांक ले। रात का भोजन इसके दो घंटे पश्चात करें। यह मूत्राशय की जलन दूर करने में अद्वितीय है। आवश्यकता अनुसार तीन से सात दिन तक ले।

सदैव युवा रखने वाला, शरीर का पूरा कायाकल्प करने वाला सदाबहार चूर्ण।


आज बढ़ते हुए तनाव, मानसिक थकान, चिंता, शारीरिक रोग ये सब असमय ही इंसान को बूढा बना देती हैं। भरी जवानी में इंसान बूढा नज़र आने लगता हैं। अगर आप अपना योवन कायम रखना चाहते हैं तो आपको यथासंभव तनाव, चिंता को त्यागना होगा। कहा भी जाता हैं के चिंता से बड़ा कोई शारीरिक शत्रु नहीं हैं। योग करे, ध्यान करे, दोस्तों से मिले, बच्चो और बुज़ुर्गो के साथ समय बिताये, किसी क्लब का सदस्य बनिए, हफ्ते में एक दिन गौशाला जाइए, किसी गरीब को खाना खिलाये। इस से आपकी तनाव और चिंता भाग जाएगी। इसके साथ हम आज आपको बताने जा रहे हैं आयुर्वेद के एक ऐसे सदाबहार चूर्ण के बारे में जिसको खा कर आप सदा अपने आप को जवान और तंदुरुस्त महसूस करेंगे। बस इसको अपने दैनिक जीवन में शामिल करे।

आइये जाने इसको घर पर बनाने की विधि।

सामग्री।

1. सूखे आंवले का चूर्ण
2. काले तिल (साफ़ कर के) इसका चूर्ण।
3. भृंगराज (भांगरा) का चूर्ण।
4. गोखरू का चूर्ण।


पहले ये सब 100 – 100 ग्राम की मात्रा में ले कर मिला लीजिये, फिर इस में 400 ग्राम पीसी हुयी मिश्री मिला लीजिये। तत्पश्चात इसमें 100 ग्राम शुद्ध देशी गौ घृत (गाय का घी) मिला लीजिये और आखिर में इस में 200 ग्राम शहद मिला लीजिये। अब इस चूर्ण को किसी कांच के बर्तन में या घी के चिकने मिटटी के पात्र या चीनी के बर्तन में सुरक्षित रख ले। इस चूर्ण को एक चम्मच (5 ग्राम) की मात्रा में खाली पेट नित्य सेवन करे और ऊपर से गाय का दूध या गुनगुना पानी पीजिये।

सावधानी –

घी और शहद परस्पर समान मात्रा में धीमे ज़हर का काम करते हैं। इसलिए इनकी समान मात्रा नहीं लेनी।

फायदे –

इस चूर्ण से आपके शरीर का पूरा कायाकल्प हो जायेगा। यदि छोटी आयु में बाल झड़ गए हैं तो पुनः दोबारा उग आएंगे, अगर सफ़ेद हो गए हैं तो काले हो जायेंगे, और वृद्धावस्था तक काले बने रहेंगे। ढीले दांत भी मज़बूत बन जायेंगे। चेहरे पर कान्ति आ जाएगी। शरीर शक्ति शाली और बाजीकरण युक्त हो जाएगा। और कुछ ही दिनों में दुर्बल व्यक्ति भी अपना वज़न पूरा कर शक्तिशाली बन जाता हैं।

परहेज –

अंडा, मांस, मछली, नशीले पदार्थो का सेवन एवं वीर्य नाश वर्जित हैं।

पृथ्वी की संजीवनी, गेंहू के जवारे।( Wheat Grass Juice)


गेहूँ का ज्वारा अर्थात गेहूँ के छोटे-छोटे पौधों की हरी-हरी पत्ती, जिसमे है शुद्ध रक्त बनाने की अद्भुत शक्ति. तभी तो इन ज्वारो के रस को “ग्रीन ब्लड” कहा गया है. इसे ग्रीन ब्लड कहने का एक कारण यह भी है कि रासायनिक संरचना पर ध्यानाकर्षण किया जाए तो गेहूँ के ज्वारे के रस और मानव मानव रुधिर दोनों का ही पी.एच. फैक्टर 7.4 ही है, जिसके कारण इसके रस का सेवन करने से इसका रक्त में अभिशोषण शीघ्र हो जाता है, जिस से रक्ताल्पता(एनीमिया) और पीलिया(जांडिस) रोगी के लिए यह ईश्वर प्रदत्त अमृत हो जाता है। गेहूँ के ज्वारे के रस का नियमित सेवन और नाड़ी शोधन प्रणायाम से मानव शारीर के समस्त नाड़ियों का शोधन होकर मनुष्य समस्त प्रकार के रक्तविकारों से मुक्त हो जाता है। गेहूँ के ज्वारे में पर्याप्त मात्रा में क्लोरोफिल पाया जाता है जो तेजी से रक्त बनता है इसीलिए तो इसे प्राकृतिक परमाणु की संज्ञा भी दी गयी है। गेहूँ के पत्तियों के रस में विटामिन बी.सी. और ई प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
 अगर आप भयंकर से भयंकर बीमारी से ग्रस्त हैं, और आपको लगता हैं के ये बीमारिया आपकी जान ले कर ही छोड़ेंगी, और आप दवा ले ले कर थक चुके हो। तो एक बार गेंहू के जवारों को ज़रूर आज़माये।

ये कैंसर किलर हैं, कैंसर के मरीजों को ये नियमित लेना चाहिए।

ये मधुमेह के रोगियों के लिए वरदान हैं।

ये खून की कमी को चमत्कारिक रूप से पूरा करता हैं।

ये हृदय रोगियों के लिए वरदान हैं।

ये गर्भिणी महिलाओ के लिए वरदान हैं।

ये शरीर के टॉक्सिन्स को बाहर निकलता हैं।

मोटापे के रोगियों के लिए वरदान हैं।

ये शरीर की ऊर्जा को बढ़ा देता हैं, खिलाड़ियों के लिए ये वरदान हैं।

त्वचा सम्बंधित रोगो में वरदान हैं।

शरीरी की दुर्गन्ध को दूर करता हैं।

बुढ़ापे को रोकता हैं। वीर्य की कमी को पूरा करता हैं।

ऐसे ढेरो गुण समाये हैं इसमें।

गेहूँ घास के सेवन से कोष्ठबद्धता, एसिडिटी , गठिया, भगंदर, मधुमेह, बवासीर, खासी, दमा, नेत्ररोग,म्यूकस, उच्चरक्तचाप, वायु विकार इत्यादि में भी अप्रत्याशित लाभ होता है।
इसके रस के सेवन से अपार शारीरिक शक्ति कि वृद्धि होती है तथा मूत्राशय कि पथरी के लिए तो यह रामबाण है।
गेहूँ के ज्वारे से रस निकालते समय यह ध्यान रहे कि पत्तियों में से जड़ वाला सफेद हिस्सा काट कर फेंक दे। केवल हरे हिस्से का ही रस सेवन कर लेना ही विशेष लाभकारी होता है। रस निकालने के पहले ज्वारे को धो भी लेना चाहिए. यह ध्यान रहे कि जिस ज्वारे से रस निकाला जाय उसकी ऊंचाई अधिकतम पांच से छः इंच ही हो।

आप 15 छोटे छोटे गमले लेकर प्रतिदिन एक-एक गमलो में भरी गयी मिटटी में 50 ग्राम गेहू क्रमशः गेहू चिटक दे, जिस दिन आप 15 गमले में गेहू डालें उस दिन पहले दिन वाला गेहू का ज्वारा रस निकलने लायक हो जायेगा। यह ध्यान रहे की जवारे की जड़ वाला हिस्सा काटकर फेक देंगे पहले दिन वाले गमले से जो गेहू उखाड़ा उसी दिन उसमे दूसरा पुनः गेहू बो देंगे.यह क्रिया हर गमले के साथ होगी ताकि आपको नियमित ज्वारा मिलता रहे ।

गिलोय – आयुर्वेद की अमृत


गिलोय या गुडुची, जिसका वैज्ञानिक नाम टीनोस्पोरा कोर्डीफोलिया है, गिलोय का आयुर्वेद में एक महत्वपूर्ण स्थान है। इसके पत्ते पान के पत्ते कि तरह होते हैं। आयुर्वेद मे इसको कई नामो से जाना जाता है जैसे अमृता, गुडुची, छिन्नरुहा,चक्रांगी, आदि। ये एक दिव्या औषिधि हैं, मधुपर्णी मराठी में गुलवेल। इसके सेवन से आपको नयी ज़िन्दगी मिल सकती हैं। ये पुरे देश में उपलब्ध होती हैं।  इसके खास गुणों के कारण इसे अमृत के समान समझा जाता है और इसी कारण इसे अमृता भी कहा जाता है। हिन्दू शास्त्रो में ये कहा गया हैं के सागर मंथन के समय जो अमृत मिला तो वह अमृत की बूंदे जहाँ जहाँ गिरी वहां से ये अमृता (गिलोय) पैदा हुयी। प्राचीन काल से ही इन पत्तियों का उपयोग विभिन्न आयुर्वेदिक दवाइयों में एक खास तत्व के रुप में किया जाता है।
 आयुर्वेद में यह बुखार की सर्वोत्तम औषधि के रूप में मानी गई है,  कैसा भी और कितना भी पुराना बुखार हो, इसके रोज़ाना सेवन से सब सही होता हैं। गिलोय की लता पार्क में, घरो में, जंगलों, खेतों की मेड़ों, पहाड़ों की चट्टानों आदि स्थानों पर सामान्यतया कुण्डलाकार चढ़ती पाई जाती है। यह पत्‍तियां नीम और आम के पेड़ों के आस पास अधिक पाई जाती हैं। जिस वृक्ष को यह अपना आधार बनती है, उसके गुण भी इसमें समाहित रहते हैं । इस दृष्टि से नीम पर चढ़ी गिलोय श्रेष्ठ औषधि मानी जाती है।
गिलोय की पत्तियों और तनों से सत्व निकालकर इस्तेमाल में लाया जाता है। गिलोय को आयुर्वेद में गर्म तासीर का माना जाता है। यह तैलीय होने के साथ साथ स्वाद में कडवा और हल्की झनझनाहट लाने वाला होता है।
अगर आप सुबह उठ कर इसकी छोटी सी डंडी को चबा चबा कर खा लेंगे तो आपके लिए ये संजीवनी की तरह काम करेगी। और कैसा भी असाध्य रोग हो ये उस को चुटकी बजाते हुए खत्म कर देगी।   
 
गिलोय में अनेका अनेक गुण समाये हुए हैं। गिलोय शरीर के तीनो दोषों (वात, पित्, और कफ) को संतुलित करती है और शरीर का कायाकल्प करने की क्षमता रखती है। इसमें सूजन कम करने, शुगर को नियंत्रित करने, गठिया रोग से लड़ने के अलावा शरीर शोधन के भी गुण होते हैं। 
गिलोय के इस्तेमाल से सांस संबंधी रोग जैसे दमा और खांसी में फायदा होता है। 
 गिलोय का उल्टी, बेहोशी, कफ, पीलिया, धातू विकार, सिफलिस, एलर्जी सहित अन्य त्वचा विकार, चर्म रोग, झाइयां, झुर्रियां, कमजोरी, गले के संक्रमण, खाँसी, छींक, विषम ज्वर नाशक, टाइफायड, मलेरिया, डेंगू, पेट कृमि, पेट के रोग, सीने में जकड़न, जोडों में दर्द, रक्त विकार, निम्न रक्तचाप, हृदय दौर्बल्य,(टीबी), लीवर, किडनी, मूत्र रोग, मधुमेह, रक्तशोधक, रोग पतिरोधक, गैस, बुढापा रोकने वाली, खांसी मिटाने वाली, भूख बढ़ाने वाली पाकृतिक औषधि के रूप में खूब प्रयोग होता है। 
इसे नीम और आंवला के साथ मिलाकर इस्तेमाल करने से त्वचा संबंधी रोग जैसे एग्जिमा और सोराइसिस दूर किए जा सकते हैं।  इसे खून की कमी, पीलिया और कुष्ठ रोगों के इलाज में भी कारगर माना जाता है।
गिलोय एक रसायन है, यह रक्तशोधक, ओजवर्धक, ह्रुदयरोग नाशक ,शोधनाशक और लीवर टोनिक भी है। यह पीलिया और जीर्ण ज्वर का नाश करती है अग्नि को तीव्र करती है, वातरक्त और आमवात के लिये तो यह महा विनाशक है।
गिलोय का चूर्ण शहद के साथ खाने से कफ और सोंठ के साथ आमवात से सम्बंधित बीमारीयां (गठिया) रोग ठीक होता है।
सूजन कम करने के गुण के कारण, यह  गठिया और आर्थेराइटिस से बचाव में अत्यधिक लाभकारी है। गिलोय के पाउडर को सौंठ की समान मात्रा और गुगुल के साथ मिलाकर दिन में दो बार लेने से इन बीमारियों में काफी  लाभ मिलता है। इसी प्रकार अगर ताजी पत्तियां या तना उपलब्ध हों तो इनका ज्यूस पीने से भी आराम होता है।
गिलोय की जड़ें शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट है। यह कैंसर की रोकथाम और उपचार में प्रयोग की जाती है।
गिलोय का रस और गेहूं के जवारे का रस लेकर थोड़ा सा पानी मिलाकर इस में तुलसी और नीम के 5 – 7 पत्ते पीस कर मिला लीजिये इस की एक कप की मात्रा खाली पेट सेवन करने से ये रक्त कैंसर के विनाश के लिए अमृत सामान औषिधि बन जाती हैं। अगर आपकी कोई अलोपथी चिकित्सा चल रही हैं तो  आप उसके साथ में इसको कर सकते हैं। उसके साथ इसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं हैं। ये प्रयोग अनीमिया के रोगियों (जिनको बार बार खून चढ़ाना पड़ता हैं) के लिए भी अमृत सामान हैं।

गिलोय उच्च कोलेस्ट्रॉल (LDL) के स्तर को कम करने के लिए, शर्करा का स्तर बनाए रखने में मदद करता है। यह शरीर को दिल से संबंधित बीमारियों से बचाए रखता है।
गिलोय के 6 इंच के तने को लेकर कुचल ले उसमे 4 -5 पत्तियां तुलसी की मिला ले इसको एक गिलास पानी में मिला कर उबालकर इसका काढा बनाकर पीजिये। और इस काढ़े में तीन चम्मच एलोवेरा का गूदा मिला कर नियमित रूप से सेवन करते रहने से जिन्दगी भर कोई भी बीमारी नहीं आती। और इसमें पपीता के 3-4 ताज़ा पत्तो का रस मिला कर दिन में तीन चार बार (हर तीन चार घंटे के बाद) लेने से रोगी को प्लेटलेट की मात्रा में तेजी से इजाफा होता है प्लेटलेट बढ़ाने का इस से बढ़िया कोई इलाज नहीं है यह चिकन गुनियां डेंगू स्वायन फ्लू और बर्ड फ्लू में रामबाण होता है।
गैस, जोडों का दर्द ,शरीर का टूटना, असमय बुढापा वात असंतुलित होने का लक्षण हैं। गिलोय का एक चम्मच चूर्ण को घी के साथ लेने से वात संतुलित होता है ।
गिलोय और अश्वगंधा को दूध में पकाकर नियमित खिलाने से बाँझपन से मुक्ति मिलती हैं।
क्षय (टी .बी .) रोग में गिलोय सत्व, इलायची तथा वंशलोचन को शहद के साथ लेने से लाभ होता है।
गिलोय और पुनर्नवा का काढ़ा बना कर सेवन करने से कुछ दिनों में मिर्गी रोग में फायदा दिखाई देगा।
दस्त पेचिश और आंव में इस की ताज़ा डंडी को थोड़ा कूट कर इसको थोड़े से पानी के साथ पिए। आपको बहुत आराम आएगा।
एक चम्मच गिलोय का चूर्ण खाण्ड या गुड के साथ खाने से पित्त की बिमारियों में सुधार आता है और कब्ज दूर होती है।
प्रतिदिन सुबह-शाम गिलोय का रस घी में मिलाकर या शहद गुड़ या मिश्री के साथ गिलोय का रस मिलकर सेवन करने से शरीर में खून की कमी दूर होती है।
हिचकी आने पर गिलोय के काढ़े में मिश्री मिला कर देने से हिचकी सही होती हैं।
फटी त्वचा के लिए गिलोय का तेल दूध में मिलाकर गर्म करके ठंडा करें। इस तेल को फटी त्वचा पर लगाए वातरक्त दोष दूर होकर त्वचा कोमल और साफ होती है।
इसका नियमित प्रयोग सभी प्रकार के बुखार, फ्लू, पेट कृमि, खून की कमी, निम्न रक्तचाप, दिल की कमजोरी, टीबी, मूत्र रोग, एलर्जी, पेट के रोग, मधुमेह, चर्म रोग आदि अनेक बीमारियों से बचाता है।
गिलोय भूख भी बढ़ाती है। एक बार में गिलोय की लगभग 20 ग्राम मात्रा ली जा सकती है।
मुंहासे, फोड़े-फुंसियां और झाइयो पर गिलोय के फलों को पीसकर लगाये मुंहासे, फोड़े-फुंसियां और झाइयां दूर हो जाती है।
मट्ठे के साथ गिलोय का 1 चम्मच चूर्ण सुबह शाम लेने से बवासीर में लाभ होता है।
गिलोय का रास शहद के साथ मिलाकर सुबह और शाम सेवन करने से पेट का दर्द ठीक होता है।
गिलोय को पानी में घिसकर और गुनगुना करके दोनों कानो में दिन में 2 बार डालने से कान का मैल निकल जाता है। और गिलोय के पत्तों के रस को गुनगुना करके इस रस को कान में डालने से कान का दर्द ठीक होता है।
गिलोय और पुनर्नवा मूल को कूट कर इसका रस निकाल लीजिये इस में शहद मिलाकर दिन में 3-4 बार पीने से पीलिया रोग ठीक हो जाता है। यकृत(LIVER) में अगरSGOT या SGPTABNORMAL हैं या BILIRUBIN बढ़ा हैं तो भी इस से ये ठीक होता हैं।
प्रमेह,प्रदर, कमज़ोरी व् धातु क्षीणता होने पर इसको कूट कर रात में पानी मिला कर रख दीजिये और सुबह इसको निचोड़ कर इस पानी को पी लीजिये, ये थोड़ा कड़वा होगा, कड़वापन दूर करने के लिए आप इसमें मिश्री या शहद मिला कर इसको पीजिये। इसको पीने से आपके चेहरे से झुर्रिया व् झाइयां खत्म होंगी और चेहरे पर कांति आएगी। मधुमेह के रोगी इसमें शहद या मिश्री ना मिलाये।
ये बुढ़ापे को रोकने वाली, जवानी को बना कर रखने वाली दिव्या औषिधि हैं। अगर आपको किसी भी प्रकार का दाद, खाज, खुजली, एक्ज़िमा, सीरोसिस, चाहे लिवर के अंदर ट्यूमर, फाइब्रोसिस में भी ये लाभकारी हैं।
मधुमेह के रोगी अगर सुबह इसकी ६ इंच की ताज़ा डंडी को चबा चबा कर चूसे तो कुछ दिनों में उनका मधुमेह का रोग सही हो जाता हैं।
गिलोय में शरीर में शुगर और लिपिड के स्तर को कम करने का खास गुण होता है। इसके इस गुण के कारण यह डायबीटिज टाइप 2 के उपचार में बहुत कारगर है।
गिलोय रसायन यानी ताजगी लाने वाले तत्व के रुप में कार्य करता है। इससे इम्यूनिटी सिस्टम में सुधार आता है और शरीर में अतिआवश्यक सफेद सेल्स की कार्य करने की क्षमता बढ़ती है। यह शरीर के भीतर सफाई करके लीवर और किडनी के कार्य को सुचारु बनाता है। यह शरीर को बैक्टिरिया जनित रोगों से सुरक्षित रखता है। इसका उपयोग सेक्स संबंधी रोगों के इलाज में भी किया जाता है।
वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार इसमें एल्केलाइड गिलोइन नामक कड़वा ग्लूकोसाइड, वसा, अल्कोहल, ग्लिस्टरोल, अम्ल व उडऩशील तेल होते हैं। इसकी पत्तियों में कैल्शियम, प्रोटीन, फॉस्फोरस और तने में स्टार्च पाया जाता है। वायरसों की दुश्मन गिलोय रोग संक्रमण रोकने में सक्षम होती है। यह एक श्रेष्ठ एंटीबयोटिक है।
टाइफायड, मलेरिया, डेंगू, एलीफेंटिएसिस, विषम ज्वर, उल्टी, बेहोशी, कफ, पीलिया, तिल्ली बढऩा, सिफलिस, एलर्जी सहित अन्य त्वचा विकार, झाइयां, झुर्रियां, कुष्ठ आदि में गिलोय का सेवन आश्चर्यजनक परिणाम देता है। 
 यह शरीर में इंसुलिन उत्पादन क्षमता बढ़ाती है। गिलोय बीमारियों से लडऩे, उन्हें मिटाने और रोगी में शक्ति के संचरण में यह अपनी विशिष्ट भूमिका निभाती है।
शरीर में पाचनतंत्र को सुधारने में गिलोय काफी मददगार होता है। गिलोय के चूर्ण को आंवला चूर्ण या मुरब्बे के साथ खाने से गैस में फायदा होता है। 
 गिलोय के ज्यूस को छाछ के साथ मिलाकर पीने से अपाचन की समस्या दूर होती है साथ ही साथ बवासीर से भी छुटकारा मिलता है।
गिलोय एडाप्टोजेनिक हर्ब है अत:मानसिक दवाब और चिंता को दूर करने के लिए उपयोग अत्यधिक लाभकारी है। गिलोय चूर्ण को अश्वगंधा और शतावरी के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है। इसमें याददाश्त बढ़ाने का गुण होता है। यह शरीर और दिमाग पर उम्र बढ़ने के प्रभाव की गति को कम करता है।
अगर ये आपके घर में नहीं है तो आप इसको अपने घर में ज़रूर लगाये। ये भारत के असली मनी प्लांट हैं, नकली मनी प्लांट को घर से निकाल कर बाहर करे।
 
 अगर आप इसकी डंडी काट कर अपने घर में किसी गमले में या मिटटी में लगा देंगे तो ये वहां अपने आप ही उग आएगी।
गर्भवती महिलाओं को बिना चिकित्सकीय सलाह के इसके इस्तेमाल से बचना चाहिए।

Thursday, September 8, 2016

शरीर में तेजी से खून बढ़ाने के घरेलु उपाय।


शरीर में खून की कमी से बहुत बीमारियां लग सकती हैं। जिस वजह से इंसान कमजोर हो जाता है और उसका शरीर बीमारियों से लड़ नहीं पाता है। इसलिए महिलाओं और पुरूषों को शरीर में खून की मात्रा बढ़ाने के लिए इन आयुवेर्दिक उपायों को अपनाना चाहिए।

1. तिल और शहद

दो घंटे के लिए 2 चम्मच तिलों को पानी में भिगों लें और बाद में पानी से छानकर इसका पेस्ट बना लें। अब इसमें 1 चम्मच शहद मिलाएं और दिन में दो बार सेवन करें।

2. काफी और चाय खतरनाक

काफी और चाय का सेवन कम कर दें। एैसा इसलिए क्योंकि ये चीजें शरीर को आयरन लेने से रोकते हैं।

3.ठंडा स्नान

दो बार दिन में ठंडे पानी से नहाए और सुबह नहाने के बाद सूरज की रोशनी में बैठें।

4. अंकुरित भोजन 

आप अपने भोजन में गेहूं, मोठ, मूंग और चने को अंकुरित करके उसमें नींबू मिलाकर सुबह का नाश्ता लें।

5. आम

पके आम के गुदे को मीठे दूध के साथ सेवन करें। एैसा करने से खून तेजी से बढ़ता है।

6. मूंगफली और गुड़

शरीर में खून की कमी को दूर करने के लिए मूंगफली के दानों को गुड़ के साथ चबा-चबा कर सेवन करें।

7. सिंघाड़ा

सिंघाड़ा शरीर में खून और ताकत दोनो को बढ़ाता है। कच्चे सिंघाड़े को खाने से शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर तेजी से बढ़ता है।

8. मुनक्का, अनाज, किशमिश, दालें और गाजर 

मुनक्का, अनाज, किशमिश, दालें और गाजर का नियमित सेवन करें और रात को सोने से पहले दूध में खजूर डालकर उसको पीएं।

9. फलो का सेवन

अनार, अमरूद, पपीता, चीकू, सेब और नींबू आदि फलो का अधिक से अधिक सेवन करें।

10. आंवले और जामुन का रस

आंवले का रस और जामुन का रस बराबर मात्रा में मिलाकर सेवन करने से हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ता है।

11. टमाटर का रस

एक गिलास टमाटर का रस रोज पीने से भी खून की कमी दूर होती है। इसलिए टमाटर का सूप भी बनाकर आप ले सकते हो।

12. हरी सब्जिया

बथुआ, मटर, सरसों, पालक, हरा धनिया और पुदीना को अपने भोजन में जरूर शामिल करें।

13. फालसा

फालसे का शर्बत या फालसे का सेवन सुबह शाम करने से शरीर में खून की मात्रा जल्दी बढ़ती है।

14. लहसुन

शरीर में खून को बढ़ाने के लिए नियमित रूप से लहसुन और नमक की चटनी का सेवन करे। यह हीमोग्लोबिन की कमी को दूर करता है।

15. सेब का जूस

सेब का जूस रोज पीएं। चुकंदर के एक गिलास रस में अपने स्वाद के अनुसार शहद मिलाकर इसे रोज पीएं। इस जूस में लौह तत्व ज्यादा होता है।

Wednesday, September 7, 2016

घर पर ENO बनाये

घर पर ENO बनाये

अक्सर लोग गैस या एसिडिटी के लिए ENO का उपयोग करते हैं, 2-3 ग्राम ENO 5-10 रुपैये की आती है, घर पर इसको बनाना बहुत आसान है, आज हम आपको वही बताने जा रहें हैं के कैसे इसको बनाये घर पर.

सामग्री :: 100 ग्राम ENO बनाने के लिए –

4o ग्राम निम्बू सत्व
55 ग्राम मीठा खाने वाला सोडा
05 ग्राम सेंधा नमक

दोनों को मिलकर कांच की बोतल में रख देवे |
जब प्रयोग में लेना हो तो …
एक गिलास पानी 3-4 ग्राम में डाल के पिए….

एक दम ENO जैसा बन जाएगा.|
ये सब पंसारी या किरणे की शॉप में मिल जायेगा |
निम्बू सत्व 100 /- किलो और मीठा सोडा 60/- किलो मिल जायेगा |
कुल मिला कर 8/- में 100 ग्राम एनो तैयार हो जायेगा |

ऐलोवेरा साबुन।

ऐसे बनाऐ ऐलोवेरा साबुन।

ऐलोवेरा प्रकृति का वरदान है। जो खूबसूरती को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसे त्‍वचा की देखभाल का उत्‍कृष्‍ट संयंत्र माना जाता है, क्‍योंकि यह त्वचा के ऊतकों को पुनर्जीवित करने और उन्हें हमेशा स्वस्थ और हाइड्रेटेड रखने में मदद करता है। यह चेहरे की त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाने में भी सहायक होता है। ऐलोवेरा को कई प्रकार से सुंदरता को बढ़ाने और निखारने के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकता है।
ऐलोवेरा को अगर त्‍वचा के लिए अमृत कहा जाये तो अतिश्‍योक्ति नहीं होगी। इस आर्टिकल के माध्‍यम से हम आपको ऐलोवेरा साबुन बनाने के तरीके के बारे में बता रहे हैं। यह रूखी, बेजान, दागदार त्‍वचा के साथ-साथ मुंहासों, सोरायसिस आदि त्‍वचा की समस्‍या को दूर करने में भी मददगार साबित होगा। यहां दिये आसान उपाय की मदद से आप इसे आसानी से घर में बना सकते है, तो देर किस बात की, इस प्राकृतिक साबुन के फायदों का लाभ आप भी जल्‍द लें।

1 किलो ऐलोवेरा साबुन बनाने की सामग्री
110 ग्राम – ऐलोवेरा का पल्प
110 मिली – कास्टिक सोडा
750 मिली – जैतून का तेल
250 मिली – पानी
आवश्‍यक तेल (वैकल्पिक)


ऐलोवेरा साबुन बनाने के उपाय
इस होममेड साबुन को बनाने के लिए, ऐलोवेरा के अलावा आपको ऑलिव ऑयल, पानी, कास्टिक सोडा और और साबुन को विशेष खुशबू देने के लिए आवश्‍यक तेल की आवश्‍यकता होती है।
साबुन को बनाने के लिए खुली और हवादार जगह और दस्‍ताने पहनना आपके लिए अच्‍छा रहता है।
सबसे पहले, पानी को उबाल कर, उसे प्‍लास्टिक कंटेनर में डालें।
कंटेनर में कास्टिक सोडा मिलाये, मिश्रण को अच्‍छे से मिक्‍स करके लगभग एक घंटे के लिए ठंडा होने के लिए छोड़ दें।
मिश्रण के ठंडा होने तक आप चाकू और चम्‍मच की मदद से ऐलोवेरा को काटकर उसका पल्‍प निकाल लें।
ऐलोवेरा पल्‍प को अच्‍छे से मैश करें और ऑलिव ऑयल को माइक्रावेव में गर्म करें।
जब मिश्रण ठंडा हो जाये तो इसमें धीरे-धीरे जैतून का तेल मिलाये।
मिश्रण के गाढ़ा होने तक आप इसे एक ही दिशा में हिलाना न भूलें।
अब इस मिश्रण में ऐलोवेरा को मिलाकर अच्‍छे से हिलाये और इसके सेट होने पर आप चाहे तो अपनी इच्‍छानुसार थोड़ा सा आवश्‍यक तेल जैसे लैवेंडर, गुलाब आदि मिला सकते हैं।
अंत में, जब आपका मिश्रण एक सामान हो जाये तो इसे बड़े और गहरे सांचे में डालें। अगले दिन, यह और अधिक ठोस हो जाता है। अब आप इस ऐलोवेरा साबुन को टुकड़ों में काट लें।
इसे इस्‍तेमाल करने से पहला पर्याप्‍त रूप से ठोस होने के लिए 15-30 दिन का समय दें।

मक्खी और मच्छरों को दूर भागने का बहुत बढ़िया उपाय

मक्खी और मच्छरों को दूर भागने का बहुत बढ़िया उपाय…….. !

* कभी -कभी आप इस प्रकार की खुली जगह पे सोने को मजबूर होते है जब घर में लाईट नहीं आती है तो छत पे सोना होता है और गुड नाईट या आल आउट न लगा पाना आपकी मज़बूरी है और ये स्वस्थ्य के लिए हानिकारक भी हैं। ऐसे में ये मच्छर महाशय आपको सोने नहीं देते है। फिर आप रात भर तालियाँ बजाते रहते है और सो नहीं पाते है…. !
* तो मित्रो एक साधारण सा उपाय है एक नीबू को बीच से आधा काट लो दोनों अलग -अलग टुकड़ों में 10-15 लौंग घुसा दीजिये, और साथ में रख लीजिये, मच्छर पास आने की हिम्मत भी नहीं करेंगे.

* जब भी आप कहीं बाहर आउटिंग पर जायें, तो अपने साथ कुछ नीम्बू जरूर लेते जाइये, ये मक्खी और मच्छरों को दूर भागने का बहुत बढ़िया उपाय है…

काली खांसी – कुकर खांसी में पूर्णत: तथा स्थायी लाभ।

 भुनी फिटकरी 2 ग्रेन (एक रत्ती) और मिश्री 2 ग्रेन (एक रत्ती) दोनों को मिलाकर दिन में दो बार खिलाई, जिस से लगभग 35 बच्चों को काली खांसी में पूर्णत: तथा स्थायी लाभ हुआ, चूँकि हमारे यहाँ बच्चों में काली खांसी एक से दूसरे को संक्रामक रोग की भाँती होती गयी।”

विशेष।

ये प्रयोग पांच दिन तक करें। आवश्यकता पड़ने पर एक दो दिन बढ़ाये जा सकते हैं। बड़ो को इसकी खुराक दोगुनी दें। और यदि बिना पानी के ना ले सकें तो एक दो घूँट गर्म पानी ऊपर से मिलाएं।

साइनस और नाक से जुड़ी सभी बीमारियों के लिए

 साइनस और नाक से जुड़ी सभी बीमारियों के लिए जैसे नाक की हड्डी बढना, नजला, सिरदर्द, छींकें इत्यादि के लिए बेहद ही सरल सा रामबाण उपाय है

शुद्ध देशी गाय का घी
जो आपको बहुत महंगा मिलेगा
इसकी 2-2 बूद गुनगुना करके रात्रि में सोने से पहले दोनो नासिकाओ में डाले और बहुत हल्का सा पिछे की ओर खींचे जैसे सास लेते हैं
जब पहला नाक में डाले तो दूसरी नाक को बंद करके हल्का सा ऊपर खींचे। इसी तरह जब दूसरी नाक में डाले तो पहली, नाक बंद रखे और हल्का सा ऊपर खींचे। बिना तकिया लिए 15 मिनट तक लेटे रहे फिर तकिया लगाकर से जाये, बिना किसी से बात किये।


                                                          AND

रीठा चूर्ण 1 ग्राम तथा 2-३ ग्राम त्रिकटु चूर्ण को 50 मि ली पानी में डाल कर रखे 24 घंटे के लिए। प्रात: जल को निथार कर अलग शीशी में भरकर रखे। इस जल की 4-5 बूंदे प्रतिदिन नाक में डालने से अंदर जमा हुआ कफ बाहर निकल जाता हैं। इस से नासारंध्र खुल जाते हैं व् सर दर्द में भी तुरंत लाभ होता हैं। ये चमत्कारिक नुस्खा श्वास, सिर दर्द और कफ के रोग में भी बहुत उपयोगी हैं।
त्रिकटु चूर्ण – सौंठ काली मिर्च व् पिप्पली को समान मात्रा में मिलाकर बने चूर्ण को त्रिकटु चूर्ण कहते हैं।

अलसी – एक चमत्कारी आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक दैविक भोजन।

अलसी – एक चमत्कारी आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक दैविक भोजन।

गुणधर्म –

अलसी एक प्रकार का तिलहन है। इसका बीज सुनहरे रंग का तथा अत्यंत चिकना होता है। फर्नीचर के वार्निश में इसके तेल का आज भी प्रयोग होता है। आयुर्वेदिक मत के अनुसार अलसी वातनाशक, पित्तनाशक तथा कफ निस्सारक भी होती है। मूत्रल प्रभाव एवं व्रणरोपण, रक्तशोधक, दुग्धवर्द्धक, ऋतुस्राव नियामक, चर्मविकारनाशक, सूजन एवं दरद निवारक, जलन मिटाने वाला होता है। यकृत, आमाशय एवं आँतों की सूजन दूर करता है। बवासीर एवं पेट विकार दूर करता है। सुजाकनाशक तथा गुरदे की पथरी दूर करता है। अलसी में विटामिन बी एवं कैल्शियम, मैग्नीशियम, काॅपर, लोहा, जिंक, पोटेशियम आदि खनिज लवण होते हैं। इसके तेल में 36 से 40 प्रतिशत ओमेगा-3 होता है।

जब से परिष्कृत यानी “रिफाइन्ड तेल” (जो बनते समय उच्च तापमान, हेग्जेन, कास्टिक सोडा, फोस्फोरिक एसिड, ब्लीचिंग क्ले आदि घातक रसायनों के संपर्क से गुजरता है), ट्रांसफेट युक्त पूर्ण या आंशिक हाइड्रोजिनेटेड वसा यानी वनस्पति घी (जिसका प्रयोग सभी पैकेट बंद खाद्य पदार्थों व बेकरी उत्पादनों में धड़ल्ले से किया जाता है), रासायनिक खाद, कीटनाशक, प्रिजर्वेटिव, रंग, रसायन आदि का प्रयोग बढ़ा है तभी से डायबिटीज के रोगियों की संख्या बढ़ी है। हलवाई और भोजनालय भी वनस्पति घी या रिफाइन्ड तेल का प्रयोग भरपूर प्रयोग करते हैं और व्यंजनों को तलने के लिए तेल को बार-बार गर्म करते हैं जिससे वह जहर से भी बदतर हो जाता है। शोधकर्ता इन्ही को डायबिटीज का प्रमुख कारण मानते हैं। पिछले तीन-चार दशकों से हमारे भोजन में ओमेगा-3 वसा अम्ल की मात्रा बहुत ही कम हो गई है और इस कारण हमारे शरीर में ओमेगा-3 व ओमेगा-6 वसा अम्ल यानी हिंदी में कहें तो ॐ-3 और ॐ-6 वसा अम्लों का अनुपात 1:40 या 1:80 हो गया है जबकि यह 1:1 होना चाहिये। यह भी डायबिटीज का एक बड़ा कारण है। डायबिटीज के नियंत्रण हेतु आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक व दैविक भोजन अलसी को “अमृत“ तुल्य माना गया है।

अलसी शरीर को स्वस्थ रखती है व आयु बढ़ाती है। अलसी में 23 प्रतिशत ओमेगा-3 फेटी एसिड, 20 प्रतिशत प्रोटीन, 27 प्रतिशत फाइबर, लिगनेन, विटामिन बी ग्रुप, सेलेनियम, पोटेशियम, मेगनीशियम, जिंक आदि होते हैं। सम्पूर्ण विश्व ने अलसी को सुपर स्टार फूड के रूप में स्वीकार कर लिया है और इसे आहार का अंग बना लिया है, लेकिन हमारे देश की स्थिति बिलकुल विपरीत है । अलसी को अतसी, उमा, क्षुमा, पार्वती, नीलपुष्पी, तीसी आदि नामों से भी पुकारा जाता है। अलसी दुर्गा का पांचवा स्वरूप है। प्राचीनकाल में नवरात्री के पांचवे दिन स्कंदमाता यानी अलसी की पूजा की जाती थी और इसे प्रसाद के रूप में खाया जाता था। जिससे वात, पित्त और कफ तीनों रोग दूर होते है।

ओमेगा-3 हमारे शरीर की सारी कोशिकाओं, उनके न्युक्लियस, माइटोकोन्ड्रिया आदि संरचनाओं के बाहरी खोल या झिल्लियों का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यही इन झिल्लियों को वांछित तरलता, कोमलता और पारगम्यता प्रदान करता है। ओमेगा-3 का अभाव होने पर शरीर में जब हमारे शरीर में ओमेगा-3 की कमी हो जाती है तो ये भित्तियां मुलायम व लचीले ओमेगा-3 के स्थान पर कठोर व कुरुप ओमेगा-6 फैट या ट्रांस फैट से बनती है, ओमेगा-3 और ओमेगा-6 का संतुलन बिगड़ जाता है, प्रदाहकारी प्रोस्टाग्लेंडिन्स बनने लगते हैं, हमारी कोशिकाएं इन्फ्लेम हो जाती हैं, सुलगने लगती हैं और यहीं से ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, डिप्रेशन, आर्थ्राइटिस और कैंसर आदि रोगों की शुरूवात हो जाती है।

आयुर्वेद के अनुसार हर रोग की जड़ पेट है और पेट साफ रखने में यह इसबगोल से भी ज्यादा प्रभावशाली है। आई.बी.एस., अल्सरेटिव कोलाइटिस, अपच, बवासीर, मस्से आदि का भी उपचार करती है अलसी।
अलसी शर्करा ही नियंत्रित नहीं रखती, बल्कि मधुमेह के दुष्प्रभावों से सुरक्षा और उपचार भी करती है। अलसी में रेशे भरपूर 27% पर शर्करा 1.8% यानी नगण्य होती है। इसलिए यह शून्य-शर्करा आहार कहलाती है और मधुमेह के लिए आदर्श आहार है। अलसी बी.एम.आर. बढ़ाती है, खाने की ललक कम करती है, चर्बी कम करती है, शक्ति व स्टेमिना बढ़ाती है, आलस्य दूर करती है और वजन कम करने में सहायता करती है। चूँकि ओमेगा-3 और प्रोटीन मांस-पेशियों का विकास करते हैं अतः बॉडी बिल्डिंग के लिये भी नम्बर वन सप्लीमेन्ट है अलसी।
अलसी कॉलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर और हृदयगति को सही रखती है। रक्त को पतला बनाये रखती है अलसी। रक्तवाहिकाओं को साफ करती रहती है अलसी।

चश्में से भी मुक्ति दिला देती है अलसी। दृष्टि को स्पष्ट और सतरंगी बना देती है अलसी।
अलसी एक फीलगुड फूड है, क्योंकि अलसी से मन प्रसन्न रहता है, झुंझलाहट या क्रोध नहीं आता है, पॉजिटिव एटिट्यूड बना रहता है यह आपके तन, मन और आत्मा को शांत और सौम्य कर देती है। अलसी के सेवन से मनुष्य लालच, ईर्ष्या, द्वेश और अहंकार छोड़ देता है। इच्छाशक्ति, धैर्य, विवेकशीलता बढ़ने लगती है, पूर्वाभास जैसी शक्तियाँ विकसित होने लगती हैं। इसीलिए अलसी देवताओं का प्रिय भोजन थी। यह एक प्राकृतिक वातानुकूलित भोजन है।

माइन्ड का Sim card है अलसी यहां सिम का मतलब सेरीनिटी, इमेजिनेशन और मेमोरी तथा कार्ड का मतलब कन्सन्ट्रेशन, क्रियेटिविटी, अलर्टनेट, रीडिंग राईटिंग थिंकिंग एबिलिटी और डिवाइन है।
त्वचा, केश और नाखुनों का नवीनीकरण या जीर्णोद्धार करती है अलसी। अलसी के शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट ओमेगा-3 व लिगनेन त्वचा के कोलेजन की रक्षा करते हैं और त्वचा को आकर्षक, कोमल, नम, बेदाग व गोरा बनाते हैं। अलसी सुरक्षित, स्थाई और उत्कृष्ट भोज्य सौंदर्य प्रसाधन है जो त्वचा में अंदर से निखार लाता है। त्वचा, केश और नाखून के हर रोग जैसे मुहांसे, एग्ज़ीमा, दाद, खाज, खुजली, सूखी त्वचा, सोरायसिस, ल्यूपस, डेन्ड्रफ, बालों का सूखा, पतला या दोमुंहा होना, बाल झड़ना आदि का उपचार है अलसी। चिर यौवन का स्रोता है अलसी। बालों का काला हो जाना या नये बाल आ जाना जैसे चमत्कार भी कर देती है अलसी। किशोरावस्था में अलसी के सेवन करने से कद बढ़ता है।

लिगनेन का सबसे बड़ा स्रोत अलसी ही है जो जीवाणुरोधी, विषाणुरोधी, फफूंदरोधी और कैंसररोधी है। अलसी शरीर की रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ कर शरीर को बाहरी संक्रमण या आघात से लड़ने में मदद करती हैं और शक्तिशाली एंटी-आक्सीडेंट है। लिगनेन वनस्पति जगत में पाये जाने वाला एक उभरता हुआ सात सितारा पोषक तत्व है जो स्त्री हार्मोन ईस्ट्रोजन का वानस्पतिक प्रतिरूप है और नारी जीवन की विभिन्न अवस्थाओं जैसे रजस्वला, गर्भावस्था, प्रसव, मातृत्व और रजोनिवृत्ति में विभिन्न हार्मोन्स् का समुचित संतुलन रखता है। लिगनेन मासिकधर्म को नियमित और संतुलित रखता है। लिगनेन रजोनिवृत्ति जनित-कष्ट और अभ्यस्त गर्भपात का प्राकृतिक उपचार है। लिगनेन दुग्धवर्धक है। लिगनेन स्तन, बच्चेदानी, आंत, प्रोस्टेट, त्वचा व अन्य सभी कैंसर, एड्स, स्वाइन फ्लू तथा एंलार्ज प्रोस्टेट आदि बीमारियों से बचाव व उपचार करता है।
जोड़ की हर तकलीफ का तोड़ है अलसी। जॉइन्ट रिप्लेसमेन्ट सर्जरी का सस्ता और बढ़िया उपचार है अलसी। ­­ आर्थ्राइटिस, शियेटिका, ल्युपस, गाउट, ओस्टियोआर्थ्राइटिस आदि का उपचार है अलसी।
कई असाध्य रोग जैसे अस्थमा, एल्ज़ीमर्स, मल्टीपल स्कीरोसिस, डिप्रेशन, पार्किनसन्स, ल्यूपस नेफ्राइटिस, एड्स, स्वाइन फ्लू आदि का भी उपचार करती है अलसी। कभी-कभी चश्में से भी मुक्ति दिला देती है अलसी। दृष्टि को स्पष्ट और सतरंगी बना देती है अलसी।

अलसी बांझपन, पुरूषहीनता, शीघ्रस्खलन व स्थम्भन दोष में बहुत लाभदायक है।
मीनोपोज़ (माहवारी सम्बंधित) की तकलीफों पर पॉज़ लगा देती है अलसी।
पुरुषरोग में सस्टेन्ड रिलीज़ वियाग्रा है अलसी। जो अलसी खाये वो गाये जवानी ज़िंदाबाद बुढ़ापा बाय बाय।
पुरूष को कामदेव तो स्त्रियों को रति बनाती है अलसी।
बॉडी बिल्डिंग के लिये नम्बर वन सप्लीमेन्ट है अलसी।
जोड़ की तकलीफों का तोड़ है अलसी। जॉइन्ट रिप्लेसमेन्ट सर्जरी का सस्ता और बढ़िया विकल्प है अलसी।
क्रूर, कुटिल, कपटी, कठिन, कष्टप्रद कर्करोग का सस्ता, सरल, सुलभ, संपूर्ण और सुरक्षित समाधान है अलसी।
1952 में डॉ. योहाना बुडविग ने ठंडी विधि से निकले अलसी के तेल, पनीर, कैंसररोधी फलों और सब्ज़ियों से कैंसर के उपचार का तरीका विकसित किया था जो बुडविग प्रोटोकोल के नाम से जाना जाता है। यह कर्करोग का सस्ता, सरल, सुलभ, संपूर्ण और सुरक्षित समाधान है। उन्हें 90 प्रतिशत से ज्यादा सफलता मिलती थी। इसके इलाज से वे रोगी भी ठीक हो जाते थे जिन्हें अस्पताल में यह कहकर डिस्चार्ज कर दिया जाता था कि अब कोई इलाज नहीं बचा है, वे एक या दो धंटे ही जी पायेंगे सिर्फ दुआ ही काम आयेगी। उन्होंने सशर्त दिये जाने वाले नोबल पुरस्कार को एक नहीं सात बार ठुकराया।

अलसी सेवन का तरीकाः-

हमें प्रतिदिन 30 – 60 ग्राम अलसी का सेवन करना चाहिये। 30 ग्राम आदर्श मात्रा है। अलसी को रोज मिक्सी के ड्राई ग्राइंडर में पीसकर आटे में मिलाकर रोटी, पराँठा आदि बनाकर खाना चाहिये। डायबिटीज के रोगी सुबह शाम अलसी की रोटी खायें। कैंसर में बुडविग आहार-विहार की पालना पूरी श्रद्धा और पूर्णता से करना चाहिये। इससे ब्रेड, केक, कुकीज, आइसक्रीम, चटनियाँ, लड्डू आदि स्वादिष्ट व्यंजन भी बनाये जाते हैं।

अलसी को सूखी कढ़ाई में डालिये, रोस्ट कीजिये (अलसी रोस्ट करते समय चट चट की आवाज करती है) और मिक्सी से पीस लीजिये. इन्हें थोड़े दरदरे पीसिये, एकदम बारीक मत कीजिये. भोजन के बाद सौंफ की तरह इसे खाया जा सकता है .
अलसी की पुल्टिस का प्रयोग गले एवं छाती के दर्द, सूजन तथा निमोनिया और पसलियों के दर्द में लगाकर किया जाता है। इसके साथ यह चोट, मोच, जोड़ों की सूजन, शरीर में कहीं गांठ या फोड़ा उठने पर लगाने से शीघ्र लाभ पहुंचाती है। यह श्वास नलियों और फेफड़ों में जमे कफ को निकाल कर दमा और खांसी में राहत देती है।
इसकी बड़ी मात्रा विरेचक तथा छोटी मात्रा गुर्दो को उत्तेजना प्रदान कर मूत्र निष्कासक है। यह पथरी, मूत्र शर्करा और कष्ट से मूत्र आने पर गुणकारी है। अलसी के तेल का धुआं सूंघने से नाक में जमा कफ निकल आता है और पुराने जुकाम में लाभ होता है। यह धुआं हिस्टीरिया रोग में भी गुण दर्शाता है। अलसी के काढ़े से एनिमा देकर मलाशय की शुद्धि की जाती है। उदर रोगों में इसका तेल पिलाया जाता हैं।

अलसी के तेल और चूने के पानी का इमल्सन आग से जलने के घाव पर लगाने से घाव बिगड़ता नहीं और जल्दी भरता है। पथरी, सुजाक एवं पेशाब की जलन में अलसी का फांट पीने से रोग में लाभ मिलता है। अलसी के कोल्हू से दबाकर निकाले गए (कोल्ड प्रोसेस्ड) तेल को फ्रिज में एयर टाइट बोतल में रखें। स्नायु रोगों, कमर एवं घुटनों के दर्द में यह तेल पंद्रह मि.ली. मात्रा में सुबह-शाम पीने से काफी लाभ मिलेगा।
इसी कार्य के लिए इसके बीजों का ताजा चूर्ण भी दस-दस ग्राम की मात्रा में दूध के साथ प्रयोग में लिया जा सकता है। यह नाश्ते के साथ लें।

बवासीर, भगदर, फिशर आदि रोगों में अलसी का तेल (एरंडी के तेल की तरह) लेने से पेट साफ हो मल चिकना और ढीला निकलता है। इससे इन रोगों की वेदना शांत होती है।

अलसी के बीजों का मिक्सी में बनाया गया दरदरा चूर्ण पंद्रह ग्राम, मुलेठी पांच ग्राम, मिश्री बीस ग्राम, आधे नींबू के रस को उबलते हुए तीन सौ ग्राम पानी में डालकर बर्तन को ढक दें। तीन घंटे बाद छानकर पीएं। इससे गले व श्वास नली का कफ पिघल कर जल्दी बाहर निकल जाएगा। मूत्र भी खुलकर आने लगेगा।

इसकी पुल्टिस हल्की गर्म कर फोड़ा, गांठ, गठिया, संधिवात, सूजन आदि में लाभ मिलता है।

डायबिटीज के रोगी को कम शर्करा व ज्यादा फाइबर खाने की सलाह दी जाती है। अलसी व गैहूं के मिश्रित आटे में (जहां अलसी और गैहूं बराबर मात्रा में हो)