Tuesday, January 10, 2017

स्वस्थ रहने के आसान उपाय


1.सुबह जल्दी उठो और 4-; 6 किलोमीटर रोज टहलो। संभव हो तो शाम को भी थोड़ा टहलो।
2. टहलते समय नाक से लम्बी- लम्बी सांसें लो तथा यह भावना करो कि टहलने से आप अपने स्वास्थ्य को संवार रहे हैं।
3. टहलने के अलावा, दौडऩा, साइकिल चलाना, घुड़सवारी, तैरना या कोई भी खेलकूद, व्यायाम के अच्छे उपाय
हैं। स्त्रियां चक्की पीसना,,रस्सीकूदना, पानी भरना, झाड़ू- पोछा लगाना आदि घर के कामों में भी अच्छा
व्यायाम कर सकती हैं। रोज थोड़े समय छोटे बच्चों के साथ खेलना, 10- 15 मिनट खुलकर हंसना भी अच्छे व्यायाम के अंग हैं।
4. प्रात: टहलने के बाद भूख अच्छी लगती है। इस समय पौष्टिक पदार्थों का सेवन करें।
अंकुरित अन्न, भीगी मूंगफली, आंवला या इससे बना कोई पदार्थ, संतरा या मौसम्मी का रस अच्छे नाश्ता का अंग होते हैं।
5. भोजन सादा करो एवं उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करो, शांत, प्रसन्न और निश्चिन्तता पूर्वक करो और उसे
अच्छी तरह चबाचबा कर खाओ। खाते समय न बात करो और न हंसो। एकाग्र चित्त होकर भोजन करना
चाहिए।
6. भूख से कम खाओ अथवा आधा पेट खाओ, चौथाई पानी के लिए एवं चौथाई पेट हवा के लिए खाली छोड़ो।
7. भोजन में रोज अंकुरित अन्न अवश्य शामिल करो। अंकुरित अन्न में पौष्टिकता एवं खनिज लवण गुणात्मक मात्रा में बढ़ जाते हैं। इनमें मूंग सर्वोत्तम है। चना, अंकुरित या भीगी मूंगफली इसमें थोड़ी मेथी दाना एवं चुटकी भर- अजवायन मिला लें तो यह कई रोगों का प्रतिरोधक एवं प्रभावी ईलाज है।
8. मौसम की ताजा हरी सब्जी और ताजे फल खूब खाओ। जितना हो सके कच्चे खाओ अन्यथा आधी उबली/ उबली तथा कम मिर्च- मसाले, खटाई की सब्जियां खाओ। एक ग्रास रोटी के साथ चार ग्रास सब्जी के अनुपात
का प्रयास रखो।
9. आटा चोकर समेत खाओ, सम्भव हो तो हाथ का पिसा हुआ खाओ। जौ, गेहूं, चना, सोयाबीन का मिस्सी रोटी का आटा सुपाच्य एवं पौष्टिक होता है। पौष्टिकता की दृष्टि से रोटी में हरी सब्जी, पालक, मेथी, बथुआ आदि पत्तीदार सब्जी मिलाकर बनायें / खायें। दलिया / खिचड़ी में भी पत्तीदार एवं हरी सब्जियाँ मिलाकर पौष्टिकता बढ़ाई जा सकती है। सब्जियों के सूप का नित्य सेवन पौष्टिक एवं हलके भोजन का अच्छा अंग हो सकता है।
10 भोजन के साथ पानी कम से कम पियो। दोपहर के भोजन के घंटे भर बाद पानी पियें । भोजन यदि कड़ा और रूखा हो तो 2- 4 घूंट पानी अवश्य पियें।
11. प्रात: उठते ही खूब पानी पियो। दोपहर भोजन के थोड़ी देर बाद छाछ और रात को सोने के पहले उष्ण दूध अमृत समान है।
12. दिन में कम से कम दो-तीन लीटर पानी अवश्य पियो|धूम्रपान, मादक पेय- पदार्थ (जरदा, गुटखा, सॉफ्ट ड्रिंक जैसे कोकाकोला, पेप्सी इत्यादि एवं शराब आदि) सर्वथा छोड़ दो।
14. चाय- कॉफी आदि के स्थान पर सादा ठंडा या गुनगुना पानी, नींबू पानी, छाछ, गाजर, पालक चुकन्दर, लौकी, टमाटर इत्यादि सब्जियों का एव मौसम्मी या संतरा, पपीता इत्यादि फलों के रस का उपयोग लाभकारी होता है।
15. डाइबीटीज (शक्कर) के रोगी को शक्कर या उससे बने पदार्थों से पूर्ण परहेज करना चाहिए। फलों में अधिक मीठे फल का सेवन कम करें। फल के रस के बजाय फल खायें।
16. मैथि दाना और करेला मधुमेह रोग की राम बाण दवा है| मैथी दाना रोज 18/24 घंटे पानी में, जहां तक संभव हो सके मिट्टी के बर्तन में भिगोयें। दूसरे दिन सुबह नाश्ते के पहले या बाद में दानामेथी का पानी पी लें। दानामेथी अंकुरित कर सलाद में या नमक, नींबू लगाकर भी खा सकते हैं।

Monday, January 9, 2017

सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज (सिफलिस/ GONORRHEA)

सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज
नाम से ही स्पष्ट है यह अधिकतर उन लोगों को होता है जो अपने जीवनसाथी को छोड़ कर बाहर गंदी औरतों या आदमियों के साथ संभोग करते हैं या सेक्स संबंध बनाते हैं
इसलिए ऐसे संबंध बनाते समय सावधानी बरतनी चाहिए एक बार जिसे यह रोग हो जाए उसका भगवान ही मालिक होता hi उसकी पीढ़ियां तक इसके जहर को bogti रहती है
इसके इलाज एक से एक बेहतर आज एंटीबायोटिक्स और आयुर्वेदिक मेडिसिंस के कारण संभव हो चुका है वह भी पहली और दूसरी स्टेज में तीसरी स्टेज में जाकर इसका कोई इलाज नहीं होता केवल लक्षणों को कम कर सकते हैं
इस बीमारी से बचने का सीधा सरल उपाय है कि केवल अपने जीवन साथी के साथ ही संबंध रखे जाएं अगर फिर भी किसी को यह बीमारी हो जाए तो जल्दी से जल्दी किसी हॉस्पिटल के डॉक्टर के पास इलाज करवाना चाहिए ताकि बीमारी को बढ़ने से पहले ही रोका जा सके
कभी भगवान न करे आप ऐसी परिस्थिति में फंस जाए तो घबराने की जरूरत नहीं है जब भी कभी आप ऐसी परिस्थिति में फंस जाए तो परिस्थिति पैदा होने के 15 दिन के बाद एक आप साधारण सर टेस्ट करके इस रोग के बारे में जान सकते हैं
Test name VDRL
यह साधारण सा खून में होने वाला टेस्ट है और यह आपको बता देगा कि आप को इस बैक्टीरिया से इन्फेक्शन हुआ है या नहीं हुआ अगर एक बार यह टेस्ट नेगेटिव आ जाए तो 3 महीने के बाद फिर दोबारा करवाना चाहिए कहां की कंफर्म हो जाएगी आपको इस बीमारी से कोई प्रॉब्लम नहीं है
उपदंश एक गर्मी का रोग होता है। अगर कोई स्वस्थ व्यक्ति किसी उपदंश के रोगी के साथ संभोगक्रिया करता है तो इसके कारण उस स्वस्थ व्यक्ति की जननेन्द्रिय में जख्म पैदा हो जाता है। यह जख्म 2 तरह का होते हैं-कठिन-जख्म और कोमल-जख्म।
कठिन-जख्म में रोगी के पूरे शरीर का खून खराब हो जाता है लेकिन कोमल-जख्म में रोगी के पूरे शरीर का खून खराब नहीं होता।
अगर किसी स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में उपदंश का विष घुस जाता है तो इसका असर होने में लगभग 20 दिन लग जाते हैं। जब यह रोग अदृश्य अवस्था में रहता है तब यह अन्दर ही अन्दर बाहर प्रकट होने की गति बढ़ा रहा होता है, उपदंश रोग की इस अदृश्य अवस्था को स्थिति-काल कहा जाता है। इस अवस्था में रोगी के शरीर पर उपदंश रोग के किसी तरह के लक्षण नज़र नहीं आते। स्थिति-काल के बाद जब रोग प्रकट होता है तब वह 3 अवस्थाओं से गुजरता है- प्राथमिक अवस्था, द्वितीय अवस्था तथा तृतीय अवस्था। पोस्ट बाय कृष्ण कुमार डावर
प्राथमिक अवस्था :-
उपदंश रोग के रोगी के साथ संभोग करने से, उसके मुंह से मुंह मिलाने से, उसके प्रयोग किए हुए तौलिए, कपड़े आदि से, रोगी की त्वचा के कटे हुए स्थान या मुंह आदि की श्लैष्मिक-झिल्ली द्वारा रोगी व्यक्ति का जहर स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में पहुंच जाता है। लगभग 20 दिन के बाद जिस व्यक्ति के शरीर में जिस स्थान पर उपदंश का जहर पहुंचा होता है उस स्थान में खुजली होने लगती है। वहां पर मटर के दाने जैसा, बिना मवाद वाला एक गोल सा जख्म बन जाता है जिसके चारों ओर की धार ऊंची और सख्त होती है, बीच का भाग गहरा होता है, रोगी के जांघ के पास वाली ग्रन्थि बढ़ने लगती है, सख्त हो जाती है जिसे बाघी कहते हैं। धीरे-धीरे रोगी का जख्म ठीक होने लगता है, बाघी भी कुछ बैठ सी जाती है। यह उपदंश रोग की प्राथमिक अवस्था होती है जो 2 सप्ताह से लेकर 6 महीने तक भी रह सकती है।watup 7206283295
द्वितीय अवस्था :-
उपदंश रोग की दूसरी अवस्था में रोगी को जख्म पैदा हो जाने के लगभग 3-4 महीने के बाद बुखार आने लगता है, उसका शरीर कमजोर होता जाता है, सिर में दर्द रहता है, शरीर में खून की कमी हो जाती है, रोगी के मुंह और गले में जख्म हो जाते हैं, बाल झड़ने लगते हैं, जोड़ों में दर्द रहता है।
तृतीय अवस्था :-
उपदंश के रोग की 2-3 साल में तीसरी अवस्था चालू हो जाती है। इस अवस्था में रोगी की हडि्डयां गलने लगती है, अस्थि-परिवेष्टन (हडि्डयों के ऊपर उन्हें लपेटने वाली परत) में किसी तरह का रोग होने के कारण हडि्डयों में दर्द होने लगता है, रोगी के अंडकोष, जिगर आदि में ट्यूमर बन जाते हैं, गले में जख्म हो जाता है, रोगी को रात को सोते समय बहुत ज्यादा परेशानियां आती है।
उपदंश रोग की प्राथमिक अवस्था की विभिन्न औषधियों द्वारा चिकित्सा-
1. सिफिलीनम- उपदंश रोग की चिकित्सा के दौरान इस रोग की तीनों अवस्थाओं में सिफिलीनम औषधि की 1 मात्रा शुरूआती 2-3 महीनों तक हफ्ते में 1 बार और फिर 15 दिन में एक बार रोगी को देते रहने से बहुत लाभ मिलता है। अगर रोगी को रात में ज्यादा परेशानी हो तो यह औषधि बहुत आराम पहुंचाती है।
2. नाइट्रिक-एसिड- अगर उपदंश रोग का रोगी मर्करी की औषधियों से अपनी चिकित्सा करवा चुका है लेकिन उसे किसी तरह का लाभ नहीं मिला और उसके शरीर में जख्मों वाले स्थान पर मस्से से पैदा हो गए हो उसे नाइट्रिक-एसिड औषधि की 30 शक्ति हर 4 घंटे के बाद देना लाभकारी रहता है।
3. गुआएकम- अगर उपदंश रोग के शुरूआती फोड़े ठीक होने में देर लग रही हो, कठिन-जख्म हो, लिंग के मुंह के आगे की त्वचा सूज गई हो तो रोगी को गुआएकम औषधि का मूल-अर्क या 6 शक्ति का प्रयोग करवाया जा सकता है।
उपदंश रोग की द्वितीय अवस्था की विभिन्न औषधियों द्वारा चिकित्सा-
1. मर्क-सौल- मर्क-सौल को उपदंश रोग की एक बहुत ही खास औषधि माना जाता है। यह औषधि जननेन्द्रिय के कोमल-जख्म, बाघी और बुखार में बहुत अच्छा असर करती है। रोगी के गले में जख्म हो जाना, रात के समय परेशानी बढ़ने के कारण नींद न आना, जख्मों में से बदबूदार स्राव का निकलते रहना, गैंग्रीन जैसे फोड़े जिनमें से अपने आप ही खून निकलता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों में रोगी को मर्क-सौल औषधि की 30 शक्ति का सेवन कराना बहुत लाभकारी रहता है।
इसके अलावा उपदंश रोग के कठिन-जख्म, जिनमें दर्द नहीं होता, पीब भी नहीं पड़ती ऐसे लक्षणों में मर्क-प्रोटो आयोडाइड औषधि अच्छा असर करती है। यह औषधि द्वितीय अवस्था के जख्मों में बहुत लाभकारी है। जब जख्म एक ही अवस्था में रहे न कम हो और न ज्यादा हो तो रोगी को मर्क-बिन आयोडाइड देनी चाहिए। गले की गांठों वाले रोगियों को उपदंश रोग की द्वितीय अवस्था तथा तृतीय अवस्था में सिन्नेबेरिस औषधि की 3ग मात्रा दी जा सकती है। मुंह तथा गले के सड़ने वाले जख्मों में तथा बच्चों को होने वाले उपदंश रोग में रोगी को मर्क-डलसिस औषधि का प्रयोग कराया जा सकता है।
2. आर्सेनिक-ऐल्बम- उपदंश रोग में आसेनिक-ऐल्बम औषधि को बहुत ही असरकारक रूप में माना जाता है। रोगी को उपदंश रोग के सड़े हुए जख्म जिनमें कि बहुत तेज दर्द होता है। ऐसे में रोगी को इस औषधि की 30 शक्ति देना लाभकारी रहता है।
3. हिपर-सल्फ- उपदंश रोग के लक्षणों में रोगी के होने वाले जख्म के बीच का भाग लाल हो जाना, जख्म के किनारे फैले हुए हो, पानी जैसा पीब निकलता हो, ग्रन्थियों में मवाद पड़ जाना, सूजन आ जाना, रात के समय दर्द होना, जख्म को छुआ भी न जा सके, सिर के बाल बहुत ज्यादा झड़ते हो तो उसे हिपर-सल्फ औषधि की 30 शक्ति देनी चाहिए।
4. नाइट्रिक-ऐसिड- नाइट्रिक-ऐसिड औषधि को उपदंश रोग के द्वितीय-अवस्था में प्रयोग किया जाता है। जख्म का सड़ जाना, उनमें बहुत ज्यादा मात्रा में दाने निकल आना, खून का निकलना, श्लैष्मिक-झिल्ली पर जख्मों के निशान पड़ जाना, जख्मों के किनारे उभर आना, बाघी में पीब पड़ने के जैसा महसूस होता है, त्वचा में तथा सिर में दर्द होता है, गले में टेढ़े-मेढ़े से जख्म पैदा हो जाते हैं, शरीर पर पीले या भूरे रंग के निशान पड़ जाते हैं, ठण्डी हवा से रोगी का रोग बढ़ जाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को नाइट्रिक-ऐसिड औषधि की 6 शक्ति दी जा सकती है।
5. मेजेरियम- मेजेरियम औषधि को उपदंश रोग में रात के समय होने वाली परेशानियों को दूर करने में बहुत ही उपयोगी माना जाता है। यह औषधि अस्थि-परिवेष्टन के दर्द में बहुत अच्छा असर करती है। टांग की हड्डी में दर्द होने के कारण हड्डी को छूना भी मुश्किल होता है। ऐसे लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। उपदंश रोग के कारण स्नायु-शूल में यह औषधि लाभकारी होती है। इस औषधि की 6 या 30 शक्ति ली जा सकती है।
6. कार्बो-ऐनीमैलिस- पारे को ज्यादा मात्रा में सेवन करने वालों के लिए यह औषधि बहुत अच्छा असर करती है। रोगी की त्वचा पर तांबे के रंग के दानों का निकल आना विशेष तौर पर चेहरे पर, जांघ तथा बगल की ग्रन्थियों का सख्त पड़ जाना जो ग्रन्थि के आसपास के भाग तक फैल जाती है। ऐसे लक्षणों में रोगी को कार्बो-ऐनीमैलिस औषधि की 3 या 30 शक्ति दी जा सकती है।
7. थूजा- अगर रोगी के लिंग की मुंह की त्वचा पर मस्से हो जाए, सफेद से जख्म पैदा हो जाए तो रोगी को थूजा औषधि की 30 शक्ति देना लाभकारी रहता है।
उपदंश रोग की तृतीय अवस्था में विभिन्न औषधियों का प्रयोग-
1. कैलि-आयोडाइड- कैलि-आयोडाइड औषधि सिर्फ उपदंश रोग की तीसरी अवस्था में ही ली जा सकती है। रोगी की हडि्डयों में काटने की तरह का दर्द होना, नाक तथा माथे की हड्डी में तपकन तथा जलन होना, गहरे जख्म, पीब वाले जख्म आदि लक्षणों में कैलि-आयोडाइड औषधि की 3 शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
2. ऑरम-मेट- ऑरम-मेट औषधि उपदंश रोग की द्वितीय तथा तृतीय अवस्था में प्रयोग की जा सकती है। मर्करी के दुरुपयोग के कारण मुंह में अल्सर हो जाना, उपदंश रोग का हमला नाक पर होना, नाक की हड्डी में जख्म हो जाना, नाक से हड्डी के टुकड़े निकलते हो, बदबूदार स्राव आता हो, चेहरे की हड्डी में दर्द होना आदि लक्षणों में ऑरम-मेट औषधि की 30 शक्ति का सेवन किया जा सकता है। इस औषधि का रोगी को सेवन कराते समय उसके मानसिक लक्षणों को भी ध्यान में रखना बहुत जरूरी है जैसे- रोगी हर समय उदास सा बैठा रहता है, उसको किसी भी चीज की खुशी नहीं होती आदि।
3. ऑरम-म्यूर- ऑरम-म्यूर औषधि ऑरम-मेट के दिए गए लक्षणों के आधार पर ही सेवन की जाती है। इस औषधि की 30 शक्ति बहुत अच्छा असर करती है।
4. फाइटोलैक्का- फाइटोलैक्का औषधि उपदंश रोग के बहुत से लक्षणों में प्रयोग की जाती है। रोगी को उपदंश रोग के कारण वात-रोग हो जाए, मांस-पेशियों के जोड़ों में दर्द जो रात को और ठंडे मौसम मे बढ़ जाता है। इस तरह के लक्षणों मे रोगी को इस औषधि की 3 शक्ति देने से लाभ मिलता है।

Sunday, January 8, 2017

संभोग शक्ति बढ़ाने के सरल घरेलू उपाय

अजवायन–100 ग्राम अजवायन को सफेद प्याज के रस में भिगोकर सुखा लें। सूखने के बाद उसे फिर से प्याज के रस में गीला करके सुखा लें। इस तरह से तीन बार करें। उसके बाद इसे कूटकर किसी बोतल में भरकर रख लें। आधा चम्मच इस चूर्ण को एक चम्मच पिसी हुई मिश्री के साथ मिलाकर खा जाएं। फिर ऊपर से हल्का गर्म दूध पी लें। करीब-करीब एक महीने तक इस मिश्रण का उपयोग करें। इस दौरान संभोग बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। यह सेक्स क्षमता को बढ़ाने वाला सबसे अच्छा उपाय है l

प्याज–आधा चम्मच सफेद प्याज का रस, आधा चम्मच शहद और आधा चम्मच मिश्री के चूर्ण को मिलाकर सुबह और शाम सेवन करें। यह मिश्रण वीर्यपतन को दूर करने के लिए काफी उपयोगी रहता है।सफेद प्याज के रस को अदरक के रस के साथ मिलाकर शुद्ध शहद तथा देशी घी पांच-पांच ग्राम की मात्रा में लेकर एक साथ मिलाकर सुबह नियम से एक माह तक सेवन करें और लाभ देखें इससे यौन क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जाती है।

इलायची – इलायची के दानों का चूर्ण 2 ग्राम, जावित्री का चूर्ण 1 ग्राम, बादाम के 5 पीस और मिश्री 10 ग्राम ले लें। बादाम को रात के समय पानी में भिगोकर रख दें। सुबह के वक्त उसे पीसकर पेस्ट की तरह बना लें। फिर उसमें अन्य पदार्थ मिलाकर तथा दो चम्मच मक्खन मिलाकर विस्तार रुप से रोजाना सुबह के वक्त इसको सेवन करें। यह वीर्य को बढ़ाता है तथा शरीर में ताकत लाकर सेक्स शक्ति को बढ़ाता है।

तुलसी– 15 ग्राम तुलसी के बीज और 30 ग्राम सफेद मुसली लेकर चूर्ण बनाएं, फिर उसमें 60 ग्राम मिश्री पीसकर मिला दें और शीशी में भरकर रख दें। 5 ग्राम की मात्रा में यह चूर्ण सुबह-शाम गाय के दूध के साथ सेवन करें इससे यौन दुर्बलता दूर होती है।

लहसुन– 200 ग्राम लहसुन पीसकर उसमें 60 मिली शहद मिलाकर एक साफ-सुथरी शीशी में भरकर ढक्कन लगाएं और किसी भी अनाज में 31 दिन के लिए रख दें। 31 दिनों के बाद 10 ग्राम की मात्रा में 40 दिनों तक इसको लें। इससे यौन शक्ति बढ़ती है।

सोंठ– 4 ग्राम सोंठ, 4 ग्राम सेमल का गोंद, 2 ग्राम अकरकरा, 28 ग्राम पिप्पली तथा 30 ग्राम काले तिल को एकसाथ मिलाकर तथा कूटकर बारीक चूर्ण बना लें। रात को सोते समय आधा चम्मच चूर्ण लेकर ऊपर से एक गिलास गर्म दूध पी लें। यह रामबाण औषधि शरीर की कमजोरी को दूर करती है और सेक्स शक्ति को बढ़ाती है।

कौंच का बीज– 100 ग्राम कौंच के बीज और 100  ग्राम तालमखाना को कूट-पीसकर चूर्ण बना लें फिर इसमें 200 ग्राम मिश्री पीसकर मिला लें। हल्के गर्म दूध में आधा चम्मच चूर्ण मिलाकर रोजाना इसको पीना चाहिए। इसको पीने से वीर्य गाढ़ा हो जाता है और नामर्दी दूर होती है।

छुहारे– चार-पांच छुहारे, दो-तीन काजू और दो बादाम को 300 ग्राम दूध में खूब अच्छी तरह से उबालकर तथा पकाकर दो चम्मच मिश्री मिलाकर रोजाना रात को सोते समय लेना चाहिए। इससे यौन इच्छा और काम करने की शक्ति बढ़ती है।

सेब–  एक सेब में जितनी हो सके उतनी लौंग लगा दीजिए। इसी तरह का एक अच्छा सा बड़े आकार का नींबू ले लीजिए। इसमें जितनी ज्यादा से ज्यादा हो सके, लौंग लगाकर दोनों फलों को एक सप्ताह तक किसी बर्तन में ढककर रख दीजिए। एक सप्ताह बाद दोनों फलों में से लौंग निकालकर अलग-अलग बोतल में भरकर रख लें। पहले दिन नींबू वाले दो लौंग को बारीक कूटकर बकरी के दूध के साथ सेवन करें। इस तरह से बदल-बदलकर 40दिनों तक 2-2 लौंग खाएं। यह एक तरह से सेक्स क्षमता को बढ़ाने वाला एक बहुत ही सरल उपाय है।

अश्वगंधा– अश्वगंधा का चूर्ण, असगंध तथा बिदारीकंद को 100-100 ग्राम की मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बना लें। चूर्ण को आधा चम्मच मात्रा में दूध के साथ सुबह और शाम लेना चाहिए। यह मिश्रण वीर्य को ताकतवर बनाकर शीघ्रपतन की समस्या से छुटकारा दिलाता है।


Saturday, January 7, 2017

बाईं ओर करवट लेकर सोने के फायदे

विशेषज्ञों का मानना है कि सोते समय हम जिस भी पोजीशन का इस्तेमाल करते हैं वह ना केवल हमारे अंगों पर, बल्कि साथ ही मस्तिष्क पर भी असर करती है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि पूरी रात एक ही पोजीशन लेकर सोना संभव नहीं है। नींद में हम हम ना जाने कितनी बार करवट बदलते हैं। हमें जिस ओर लेटने से आराम मिलता है शायद हम उसी ओर की पोज़ीशन लेकर पूरी रात सोए रहते हैं। 
लेकिन बाईं ओर करवट लेकर सोने के फायदे जानने के बाद शायद आपकी भी यही कोशिश होगी कि रातभर बाएं ओर की पोज़ीशन पकड़कर ही सोएं। दरअसल बाईं ओर करवट लेकर सोने से हमें स्वास्थ्य की दृष्टि से कई लाभ मिलते हैं। 
जैसे की: --

1. पेट को फायदा - बाईं ओर करवट लेकर सोने से पेट की कई बीमारियां में आराम मिलता है जैसे पेट के फूलने की परेशानी, पेट में गैस होने की परेशानी या फिर एसिडिटी बनने की परेशानी.
2. पाचन तंत्र को फायदा - इस तरह सोने से पेट और अग्न्याशय अपना काम जो कि खाना पचाने का कार्य है, उसको आराम से करने लगते हैं। अग्न्याशय से एंजाइम सही समय पर निकलना शुरू होता है। खाया गया भोजन भी आराम से पेट के जरिए नीचे पहुंचता है और आराम से खाना हज़म हो जाता है।
3. पेट का साफ़ होना - जब पाचन तंत्र मजबूत हो जाएगा, तो अपने आप ही सुबह पेट आसानी से साफ हो जाएगा। बाएं ओर सोने की वजह से ग्रेविटी, भोजन को छोटी आंत से बड़ी आंत तक आराम से पहुंचाने में मदद करती है। इस वजह से सुबह के समय आपका पेट आराम से साफ होगा।
4. लीवर व किडनी को फायदा - बाएं ओर करवट लेकर सोने से कभी भी हमारे लीवर और किडनी पर कोई प्रेशर नहीं पड़ता, इसका परिणाम यह होता है कि जो पेट का एसिड होता है, वह ऊपर की जगह नीचे की ओर ही जाता है, जिससे एसिडिटी और सीने की जलन नहीं होती।
5. सही रक्त प्रवाह - बायीं करवट में सोने से रक्त का प्रवाह सही रहता है, जो गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ के लिए भी अच्छा है। इसके अलावा आपके गुर्दों को काम करने में भी मदद मिलती है। एड़ी, पैरों और हाथों में सूजन भी आने की आशंका कम रहती हैं।
6. दिल को फायदा - बाएं करवट सोने से दिल पर जोर कम पड़ता है क्योंकि उस समय दिल तक खून की सप्लाई काफी अच्छी मात्रा में हो रही होती h