Sunday, July 31, 2016

नीम – एक चमत्कारिक औषधि

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नीम एक चमत्कारी वृक्ष माना जाता है। नीम जो प्रायः सर्व सुलभ वृक्ष आसानी से मिल जाता है।
नीम के पेड़ पूरे दक्षिण एशिया में फैले हैं और हमारे जीवन से जुड़े हुए हैं। नीम एक बहुत ही अच्छी वनस्पति है जो कि भारतीय पर्यावरण के अनुकूल है और भारत में बहुतायत में पाया जाता है। भारत में इसके औषधीय गुणों की जानकारी हज़ारों सालों से रही है।
भारत में एक कहावत प्रचलित है कि जिस धरती पर नीम के पेड़ होते हैं, वहाँ मृत्यु और बीमारी कैसे हो सकती है। लेकिन, अब अन्य देश भी इसके गुणों के प्रति जागरूक हो रहे हैं। नीम हमारे लिए अति विशिष्ट व पूजनीय वृक्ष है। नीम को संस्कृत में निम्ब, वनस्पति विज्ञान में ‘आज़ादिरेक्ता- इण्डिका (Azadirecta-indica) अथवा Melia azadirachta कहते है।
गुण
यह वृक्ष अपने औषधि गुण के कारण पारंपरिक इलाज में बहुपयोगी सिद्ध होता आ रहा है। नीम स्वाभाव से कड़वा जरुर होता है, परन्तु इसके औषधीय गुण बड़े ही मीठे होते है। तभी तो नीम के बारे में कहा जाता है की एक नीम और सौ हकीम दोनों बराबर है। इसमें कई तरह के कड़वे परन्तु स्वास्थ्यवर्धक पदार्थ होते है, जिनमे मार्गोसिं, निम्बिडीन, निम्बेस्टेरोल प्रमुख है। नीम के सर्वरोगहारी गुणों से भरा पड़ा है। यह हर्बल ओरगेनिक पेस्टिसाइड साबुन, एंटीसेप्टिक क्रीम, दातुन, मधुमेह नाशक चूर्ण, कोस्मेटिक आदि के रूप में प्रयोग किया जाता है। नीम की छाल में ऐसे गुण होते हैं, जो दाँतों और मसूढ़ों में लगने वाले तरह-तरह के बैक्टीरिया को पनपने नहीं देते हैं, जिससे दाँत स्वस्थ व मज़बूत रहते हैं।
चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे प्राचीन चिकित्सा ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। इसे ग्रामीण औषधालय का नाम भी दिया गया है। यह पेड़ बीमारियों वगैरह से आज़ाद होता है और उस पर कोई कीड़ा-मकौड़ा नहीं लगता, इसलिए नीम को आज़ाद पेड़ कहा जाता है। भारत में नीम का पेड़ ग्रामीण जीवन का अभिन्न अंग रहा है। लोग इसकी छाया में बैठने का सुख तो उठाते ही हैं, साथ ही इसके पत्तों, निबौलियों, डंडियों और छाल को विभिन्न बीमारियाँ दूर करने के लिए प्रयोग करते हैं। ग्रन्थ में नीम के गुण के बारे में चर्चा इस तरह है :-
निम्ब शीतों लघुग्राही कतुर कोअग्नी वातनुत।
अध्यः श्रमतुटकास ज्वरारुचिक्रिमी प्रणतु ॥
अर्थात नीम शीतल, हल्का, ग्राही पाक में चरपरा, हृदय को प्रिय, अग्नि, वाट, परिश्रम, तृषा, अरुचि, क्रीमी, व्रण, कफ, वामन, कोढ़ और विभिन्न प्रमेह को नष्ट करता है।
घरेलू उपयोग
नीम के वृक्ष की ठंण्डी छाया गर्मी से राहत देती है तो पत्ते फल-फूल, छाल का उपयोग घरेलू रोगों में किया जाता है, नीम के औषधीय गुणों को घरेलू नुस्खों में उपयोग कर स्वस्थ व निरोगी बना जा सकता है। इसका स्वाद तो कड़वा होता है, लेकिन इसके फ़ायदे तो अनेक और बहुत प्रभावशाली हैं और उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :–


• नीम के तेल से मालिश करने से विभिन्न प्रकार के चर्म रोग ठीक हो जाते हैं।
• नीम के तेल का दिया जलाने से मच्छर भाग जाते है और डेंगू , मलेरिया जैसे रोगों से बचाव होता है
• नीम की दातुन करने से दांत व मसूढे मज़बूत होते है और दांतों में कीडा नहीं लगता है, तथा मुंह से दुर्गंध आना बंद हो जाता है।
• इसमें दोगुना पिसा सेंधा नमक मिलाकर मंजन करने से पायरिया, दांत-दाढ़ का दर्द आदि दूर हो जाता है।
• नीम की कोपलों को पानी में उबालकर कुल्ले करने से दाँतों का दर्द जाता रहता है।
• नीम की पत्तियां चबाने से रक्त शोधन होता है और त्वचा विकार रहित और चमकदार होती है।
• नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर और पानी ठंडा करके उस पानी से नहाने से चर्म विकार दूर होते हैं, और ये ख़ासतौर से चेचक के उपचार में सहायक है और उसके विषाणु को फैलने न देने में सहायक है।
• चेचक होने पर रोगी को नीम की पत्तियों बिछाकर उस पर लिटाएं।
• नीम की छाल के काढे में धनिया और सौंठ का चूर्ण मिलाकर पीने से मलेरिया रोग में जल्दी लाभ होता है।
• नीम मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों को दूर रखने में अत्यन्त सहायक है। जिस वातावरण में नीम के पेड़ रहते हैं, वहाँ मलेरिया नहीं फैलता है। नीम के पत्ते जलाकर रात को धुआं करने से मच्छर नष्ट हो जाते हैं और विषम ज्वर (मलेरिया) से बचाव होता है।
• नीम के फल (छोटा सा) और उसकी पत्तियों से निकाले गये तेल से मालिश की जाये तो शरीर के लिये अच्छा रहता है।
• नीम के द्वारा बनाया गया लेप वालों में लगाने से बाल स्वस्थ रहते हैं और कम झड़ते हैं।
• नीम और बेर के पत्तों को पानी में उबालें, ठंण्डा होने पर इससे बाल, धोयें स्नान करें कुछ दिनों तक प्रयोग करने से बाल झडने बन्द हो जायेगें व बाल काले व मज़बूत रहेंगें।
• नीम की पत्तियों के रस को आंखों में डालने से आंख आने की बीमारी (कंजेक्टिवाइटिस) समाप्त हो जाती है।
• नीम की पत्तियों के रस और शहद को 2:1 के अनुपात में पीने से पीलिया में फ़ायदा होता है, और इसको कान में डालने कान के विकारों में भी फ़ायदा होता है।
• नीम के तेल की 5-10 बूंदों को सोते समय दूध में डालकर पीने से ज़्यादा पसीना आने और जलन होने सम्बन्धी विकारों में बहुत फ़ायदा होता है।
• नीम के बीजों के चूर्ण को ख़ाली पेट गुनगुने पानी के साथ लेने से बवासीर में काफ़ी फ़ायदा होता है।
• नीम की निम्बोली का चूर्ण बनाकर एक-दो ग्राम रात को गुनगुने पानी से लें कुछ दिनों तक नियमित प्रयोग करने से कब्ज रोग नहीं होता है एवं आंतें मज़बूत बनती है।
• गर्मियों में लू लग जाने पर नीम के बारीक पंचांग (फूल, फल, पत्तियां, छाल एवं जड) चूर्ण को पानी मे मिलाकर पीने से लू का प्रभाव शांत हो जाता है।
• बिच्छू के काटने पर नीम के पत्ते मसल कर काटे गये स्थान पर लगाने से जलन नहीं होती है और ज़हर का असर कम हो जाता है।
• नीम के 25 ग्राम तेल में थोडा सा कपूर मिलाकर रखें यह तेल फोडा-फुंसी, घाव आदि में उपयोग रहता है।
• गठिया की सूजन पर नीम के तेल की मालिश करें।
• नीम के पत्ते कीढ़े मारते हैं, इसलिये पत्तों को अनाज, कपड़ों में रखते हैं।
• नीम की 20 पत्तियाँ पीसकर एक कप पानी में मिलाकर पिलाने से हैजा़ ठीक हो जाता है।
• निबोरी नीम का फल होता है, इससे तेल निकला जाता है। आग से जले घाव में इसका तेल लगाने से घाव बहुत जल्दी भर जाता है।
• नीम का फूल तथा निबोरियाँ खाने से पेट के रोग नहीं होते।
• नीम की जड़ को पानी में उबालकर पीने से बुखार दूर हो जाता है।
• छाल को जलाकर उसकी राख में तुलसी के पत्तों का रस मिलाकर लगाने से दाग़ तथा अन्य चर्म रोग ठीक होते हैं।
• विदेशों में नीम को एक ऐसे पेड़ के रूप में पेश किया जा रहा है, जो मधुमेह से लेकर एड्स, कैंसर और न जाने किस-किस तरह की बीमारियों का इलाज कर सकता है।


नीम के उपयोग से लाखों लोगों को रोजगार मिलता है, आप सभी से निवेदन है कि आप नीम जैसी औषधि का अपने घर में जरूर प्रयोग करे और देश के विकास में सहयोग दे और स्वस्थ भारत और प्रगतिशील भारत का निर्माण करे और अपने धन को विदेशी कम्पनियों के पास जाने से रोक !

शय्या मूत्र (Nocturnal Enuresis)

आमतौर पर छोटे बच्चे सोते समय नींद में अनजाने में बिस्तर गीला कर देते हैं . यानि कि सोते सोते ही अनैच्छिक मूत्र त्याग हो जाता है जिसका उसे पता भी नहीं चलता अथवा गीलापन महसूस होने पर करवटें बदलता है और नींद खुलती है. कभी कभी तो सुबह ही पता चलता है. इस स्थिति को शय्या मूत्र (Bed Wetting) कहते हैं. प्रायः डेढ- दो वर्ष की आयु तक अनैच्छिक पेशियों पर नियंत्रण होने लगता है और बच्चा बिस्तर गीला करना बंद कर देता है. किन्तु यदि पाँच वर्ष या अधिक आयु में भी ऐसा हो तो चिन्ताजनक है.
कारण :-
१. भूतप्रेत आदि का भय
२. माता पिता, परिजनों से उपेक्षा
३. परिजनों, शिक्षक आदि का कठोर व्यवहार
४. डरावने सपने या स्वप्न में यथास्थान मूत्रत्याग का आभास
५. सर्दी, बारिश आदि मौसम का प्रभाव
६. पेट के कीड़े
७. हार्मोनल इम्बेलैन्स
८. मूत्रमार्ग का संक्रमण
९. मूत्राशय पेशी का अनियंत्रण
१०. मधुमेह, अश्मरी आदि रोग
आदि आदि........
परिणाम:-
ऐसे बच्चों में हीनभावना, शर्मिन्दगी, भयातुरता, आत्मविश्वास की कमी, उपहास, सामाजिकता का अभाव आदि घर कर जाते हैं.
क्या करें/ न करें :-
डराना-धमकाना-पीटना न करें.
प्रेमपूर्वक व्यवहार करें.
अपमान-उपहास न करें.
दूसरे बच्चे के सामने चर्चा न करें.
आत्मविश्वास बढायें.
रात को तरल पदार्थ कम दें.
सोने से पहले मूत्र करा कर सुलायें.
रात को भी उठा कर मूत्र करायें.
पेट के कीड़े व शंकास्पद रोग की जाँच करायें.

उपचार :-

१. आँवला, काला जीरा व मिश्री समान मिलाकर आधा चम्मच तक ठण्डे पानी से खिलायें.
२. खजूर या छुहारे खिलायें.
३. जामुन गुठली चूर्ण या गूलर फल चूर्ण शहद से चटायें.
४. रात को पाँच मुनक्का अच्छे से चबा कर खिला दें.
५. रात को उड़द की मुट्ठी भर दाल भिगो कर सुबह चबा चबा कर खिलायें.
६. अजवायन एक भाग,काले तिल दो भाग व गुड़ तीन भाग कूट पीस कर पाँच ग्राम के लड्डू बना कर सुबह शाम एक एक लड्डू खिलायें.
७. स्वमूत्र में भीगी मिट्टी सुखाकर भून कर एक ग्राम शहद से खिलायें. मिट्टी साफ हो ये ध्यान रहे.
८. कृमिघ्न चिकित्सा करें.
९. अनन्नास के पत्तों का रस कृमिघ्न है.

औषध चिकित्सा:-

१. चंद्रप्रभा वटी १-२ गोली तक दें.
२. रसायन चूर्ण २-४ रत्ती तक शहद से चटायें.
३. रससिन्दूर व बंगभस्म समभाग मिलाकर आधा से एक रत्ती शहद से दें.
४. शास्त्रीय योग में वृहद वंगेश्वर, नवजीवन रस, तारकेश्वर रस, आदि दिए जा सकते हैं.
५. मानसिक बल बढाने के लिए मेध्य रसायन, ब्राह्मी वटी, आदि दे सकते हैं.
६. चिकित्सक से जाँच करवा कर यदि रोगविशेष के कारण मूत्रप्रवृति है तो उसका इलाज करवायें.


रोग चाहे छोटा हो या बड़ा, उसके परिणाम गम्भीर हो सकते हैं. अतः चिकित्सक से व्यक्तिगत परामर्श अवश्य लें. उपरोक्त बताई गई चिकित्सा में भी बच्चे की आयु, बल, शारीरिक गठन, रोगप्रकृति आदि के भेद से मात्रा व उपचार में परिवर्तन हो सकता है, अतः स्थानीय वैद्य की सलाह से ही प्रयोग करें.

increase your sex power

1..मगजे कूंच पिसा हुआ 100. ग्राम
2.. शिलाजीत 50 ग्राम
3 असगंध नागौरी 100 ग्राम
4..सफेदमुस्ली 50..ग्राम
5.. शकाकुल मिसरी 5०ग्राम
6..कुशता मुसललस 25 ग्राम
7. गिलोय सत्व 25 ग्राम
8 . आवला 100 ग्राम
9 गोखरू 100 ग्राम
10..बीजबंद 100 ग्राम
११. अभ्रकभस्म( kushta) 25 ग्राम
12. माणिक्यभस्म 25 ग्राम
13. कुशता खबसुलहदीद 25 ग्राम
14. जवाहरे मोहरा 15 ग्राम
15 . याकूत सु्रख 10 ग्राम
16 मोती छोटा खरल किया 10 ग्राम
17 मसतगी रूमी (Rome Ki ) 15 ग्राम
18 . केसर 5 ग्राम
19 . कुशता चांदी 5 ग्राम
20 . कुशता अकीक 5 ग्राम
22 . पुष्पधनवा रस 50 ग्राम 

किसी भी मौसम में सेवन कर सकते हैं सबसे पहले कूंच बीज को रात में भिगोकर रखें और सबेरे छिलके उतार कर दो घंटे सुखाकर चूर्ण बनाकर अलग रखें
सभी औषधी पीसकर मिक्स कर दे
यह सभी सामग्री आपको जड़ी बूटी केंद्र पर आसानी से मिल जाएगी
Original होनी ज़रूरी है
सबका पावडर बना लें या गोली बना लें
सुबह शाम आधा चम्मच पावडर या दो गोली एक गिलास दूध को शहद से मीठा करके लेवें
इस दवाई को किसी भी उमर मे यूज़ कर सकते है
यूनानी + आयुर्वेदिक का Hours POAER
. से सैक्स कमज़ोरी
सैक्स पॉवर ,वीर्यवर्धक
,लिंग की कमजोरी
, व् सेक्सुअल सभी तरह की बीमारियों कोठीक करती है|
2 या 3 महीने लगातार करें

Sex Power और लिंग की साइज 90/Days में बढ़ाने का आयुर्वेदिक मेडिसिन

आज आपको ताकत की एक ऐसी यूनानी + आयुर्वेदिक दवाई बतारहा हूँ। जिसे आप एक बार इसतेमाल करेंगे तो सारी जिंदगी किसी दूसरी ताकत की दवाई की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस जैसी कोई Best दवाई नही है।
ताकत, जोश जवानी के लिए बड़ा फायदेमंद है।
आइये जाने कैसे बनाये-
सामग्री-

लिक्विड शिलाजीत - 40 ग्राम,
व्हाईट मुसली - 30 ग्राम...
प्रवाल कुष्ता - 20 ग्राम,
कुश्ता कलई - 20 ग्राम
गिलोय - 20 ग्राम,
आसगंध नागोरी - - 60 ग्राम,
सतावर जड़ - 15 ग्राम,
बाला - 15 ग्राम,
गुलदाउदी - 10 ग्राम,
जायफल मिरिस्टिका फ्रेग्रेंस - 5 ग्राम,
दालचीनी कपूर - 5 ग्राम,
मग़ज कूंचा - 90 ग्राम,
मकरध्वज - 20 ग्राम
सुवर्णा भस्म - 1 ग्राम,
रेग माही ..15 ग्राम
माही रूबिया 5 ग्राम
सॉअ्लब ऱूमानी 5 ग्राम
फुलफुल सफेद 5 ग्राम

कैसे बनाये-
इन सभी को बारीक़ पीसकर मिला लेवे,फिर सुबह शाम
एक-एक चमच्च लेवे 90दिन में परिणाम देखे।
इस भस्म को 90 दिन तक पीने से लिंग 2 घंटे तक ❤❤❤❤❤❤
नीचे नही बैठता और
मजबूत बनता हे और वीर्य को बहुत गाड़ा करता हे, लिंग की साइज को बढ़ाता हे,काम उतेज़ना को बढ़ाता हे, लिंग को लंबा और मोटा करने ,सेक्स में मन न 🌴🌴🌴🌴🌴🌴लगना,शुक्राणुओ की कमी और सेक्स से सम्बंधित सभी समस्या दूर करता हे,
यह नुस्का बहुत ज्यादा प्रभावशाली है

uses of बरगद

बरगद भी उपहार है....!

*बरगद के पत्तों की 20 ग्राम राख को 100
मिलीलीटर अलसी के तेल में मिलाकर मालिश करते
रहने से सिर के बाल उग आते हैं।


*बरगद के साफ कोमल पत्तों के रस में, बराबर मात्रा में
सरसों के तेल को मिलाकर आग पर पकाकर गर्म कर लें,
इस तेल को बालों में लगाने से बालों के सभी रोग दूर
हो जाते हैं।


*25-25 ग्राम बरगद की जड़ और जटामांसी का चूर्ण,
400 मिलीलीटर तिल का तेल तथा 2 लीटर गिलोय
का रस को एकसाथ मिलाकर धूप में रख दें, इसमें से
पानी सूख जाने पर तेल को छान लें। इस तेल
की मालिश से गंजापन दूर होकर बाल आ जाते हैं और
बाल झड़ना बंद हो जाते हैं।


*बरगद की जटा और काले तिल को बराबर मात्रा में
लेकर खूब बारीक पीसकर सिर पर लगायें। इसके
आधा घंटे बाद कंघी से बालों को साफ कर ऊपर से
भांगरा और नारियल की गिरी दोनों को पीसकर
लगाते रहने से बाल कुछ दिन में ही घने और लंबे हो जाते
हैं।


*दही के साथ बड़ को पीसकर बने लेप को जले हुए अंग पर
लगाने से जलन दूर होती है।


*जले हुए स्थान पर बरगद की कोपल या कोमल
पत्तों को गाय के दही में पीसकर लगाने से जलन कम
हो जाती है।


*नाक में बरगद के दूध की 2 बूंदें डालने से नकसीर (नाक
से खून बहना) ठीक हो जाती है।
*3 ग्राम बरगद की जटा के बारीक पाउडर को दूध
की लस्सी के साथ पिलाने से नाक से खून बहना बंद
हो जाता है।


*बरगद के कड़े हरे शुष्क पत्तों के 10 ग्राम दरदरे चूर्ण
को 1 लीटर पानी में पकायें, चौथाई बच जाने पर
इसमें 1 ग्राम नमक मिलाकर सुबह-शाम पीने से हर समय
आलस्य और नींद का आना कम हो जाता है।
*बिवाई की फटी हुई दरारों पर बरगद का दूध भरकर
मालिश करते रहने से कुछ ही दिनों में वह ठीक
हो जाती है।
*बरगद के लाल रंग के कोमल पत्तों को छाया में
सुखाकर पीसकर रख लें। फिर आधा किलो पानी में
इस पाउडर को 1 या आधा चम्मच डालकर पकायें, पकने
के बाद थोड़ा सा बचने पर इसमें 3 चम्मच शक्कर
मिलाकर सुबह-शाम चाय की तरह पीने से जुकाम और
नजला आदि रोग दूर होते हैं और सिर
की कमजोरी ठीक हो जाती है।


*10 ग्राम बरगद के कोमल हरे रंग के पत्तों को 150
मिलीलीटर पानी में खूब पीसकर छानकर उसमें
थोड़ी मिश्री मिलाकर सुबह-शाम 15 दिन तक सेवन
करने से दिल की घड़कन सामान्य हो जाती है।


*बरगद के दूध की 4-5 बूंदे बताशे में डालकर लगभग 40
दिन तक सेवन करने से दिल के रोग में लाभ मिलता है।


*कमर दर्द में बरगद़ के दूध की मालिश दिन में 3 बार कुछ
दिन करने से कमर दर्द में आराम आता है। बरगद का दूध
अलसी के तेल में मिलाकर मालिश करने से कमर दर्द से
छुटकरा मिलता है। कमर दर्द में बरगद के पेड़ का दूध
लगाने से लाभ होता है।

बरगद के पेड़ के फल को सुखाकर
बारीक पाउडर लेकर मिश्री के बारीक पाउडर
मिला लें। रोजाना सुबह इस पाउडर को 6 ग्राम
की मात्रा में दूध के साथ सेवन से वीर्य का पतलापन,
शीघ्रपतन आदि रोग दूर होते हैं।


*सूर्योदय से पहले बरगद़ के पत्ते तोड़कर टपकने वाले दूध
को एक बताशे में 3-4 बूंद टपकाकर खा लें। एक बार में
ऐसा प्रयोग 2-3 बताशे खाकर पूरा करें। हर हफ्ते 2-2
बूंद की मात्रा बढ़ाते हुए 5-6 हफ्ते तक यह प्रयोग
जारी रखें। इसके नियमित सेवन से शीघ्रपतन, वीर्य
का पतलापन, स्वप्नदोष, प्रमेह, खूनी बवासीर, रक्त
प्रदर आदि रोग ठीक हो जाते हैं और यह प्रयोग
बलवीर्य वृद्धि के लिए भी बहुत लाभकारी है।


*बताशे में बरगद के दूध की 5-10 बूंदे डालकर
रोजाना सुबह-शाम खाने से नपुंसकता दूर होती है।


*बरगद के पके फल को छाया में सुखाकर पीसकर चूर्ण
बना लें। इस चूर्ण को बराबर मात्रा की मिश्री के
साथ मिलाकर पीस लें। इसे एक चम्मच की मात्रा में
सुबह खाली पेट और सोने से पहले एक कप दूध से नियमित
रूप से सेवन करते रहने से कुछ हफ्तों में यौन शक्ति में बहुत
लाभ मिलता है। 3-3 ग्राम बरगद के पेड़ की कोंपले
(मुलायम पत्तियां) और गूलर के पेड़ की छाल और 6
ग्राम मिश्री को पीसकर लुगदी सी बना लें फिर इसे
तीन बार मुंह में रखकर चबा लें और ऊपर से 250 ग्राम दूध
पी लें। 40 दिन तक खाने से वीर्य बढ़ता है और संभोग
से खत्म हुई शक्ति लौट आती है।


*बरगद के दूध की पहले दिन 1 बूंद 1 बतासे डालकर
खायें, दूसरे दिन 2 बतासों पर 2 बूंदे, तीसरे दिन 3
बतासों पर 3 बूंद ऐसे 21 दिनों तक बढ़ाते हुए
घटाना शुरू करें। इससे प्रमेह और स्वप्न दोष दूर होकर
वीर्य बढ़ने लगता है।बरगद के फल छाया में सुखाकर चूर्ण
बना लें। गाय के दूध के साथ यह 1 चम्मच चूर्ण खाने से
वीर्य गाढ़ा व बलवान बनता है।


*25 ग्राम बरगद की कोपलें (मुलायम पत्तियां) लेकर
250 मिलीलीटर पानी में पकायें। जब एक चौथाई
पानी बचे तो इसे छानकर आधा किलो दूध में डालकर
पकायें। इसमें 6 ग्राम ईसबगोल की भूसी और 6 ग्राम
चीनी मिलाकर सिर्फ 7 दिन तक पीने से वीर्य
गाढ़ा हो जाता है।


*बरगद के दूध की 5-7 बूंदे बताशे में भरकर खाने से वीर्य
के शुक्राणु बढ़ते है।


*बरगद की जटा के साथ अर्जुन की छाल, हरड़, लोध्र व
हल्दी को समान मात्रा में लेकर पानी में पीसकर लेप
लगाने से उपदंश के घाव भर जाते हैं।


*बरगद का दूध उपदंश के फोड़े पर लगा देने से वह बैठ
जाती है। बड़ के पत्तों की भस्म (राख) को पान में
डालकर खाने से उपदंश रोग में लाभ होता है।


*बरगद के पत्तों से बना काढ़ा 50 मिलीलीटर
की मात्रा में 2-3 बार सेवन करने से पेशाब की जलन
दूर हो जाती है। यह काढ़ा सिर के भारीपन, नजला,
जुकाम आदि में भी फायदा करता है।


*बरगद की जटाओं के बारीक रेशों को पीसकर बने लेप
को रोजाना सोते समय स्तनों पर मालिश करके
लगाते रहने से कुछ हफ्तों में स्तनों का ढीलापन दूर
हो जाता है।


*बरगद की जटा के बारीक अग्रभाग के पीले व लाल
तन्तुओं को पीसकर लेप करने से स्तनों के ढीलेपन में
फायदा होता है।


*4 ग्राम बरगद की छाया में सुखाई हुई छाल के चूर्ण
को दूध की लस्सी के साथ खाने से गर्भपात
नहीं होता है।


*बरगद की छाल के काढ़े में 3 से 5 ग्राम लोध्र
की लुगदी और थोड़ा सा शहद मिलाकर दिन में 2
बार सेवन करने से गर्भपात में जल्द ही लाभ होता है।
योनि से रक्त का स्राव यदि अधिक हो तो बरगद
की छाल के काढ़ा में छोटे कपड़े को भिगोकर
योनि में रखें। इन दोनों प्रयोग से श्वेत प्रदर में
भी फायदा होता है।


*बरगद की कोपलों के रस में फोया भिगोकर
योनि में रोज 1 से 15 दिन तक रखने से
योनि का ढीलापन दूर होकर योनि टाईट
हो जाती है।


*पुष्य नक्षत्र और शुक्ल पक्ष में लाये हुए बरगद
की कोपलों का चूर्ण 6 ग्राम की मात्रा में
मासिक-स्राव काल में प्रात: पानी के साथ 4-6
दिन खाने से स्त्री अवश्य गर्भधारण करती है,
या बरगद की कोंपलों को पीसकर बेर के जितनी 21
गोलियां बनाकर 3 गोली रोज घी के साथ खाने से
भी गर्भधारण करने में आसानी होती है।


*बड़ की जटा के अंकुर को घोटकर
गर्भवती स्त्री को पिलाने से सभी प्रकार
की उल्टी बंद हो जाती है।


*20 ग्राम बरगद के कोमल पत्तों को 100 से 200
मिलीलीटर पानी में घोटकर रक्तप्रदर
वाली स्त्री को सुबह-शाम पिलाने से लाभ
होता है। स्त्री या पुरुष के पेशाब में खून
आता हो तो वह भी बंद हो जाता है।
*10 ग्राम बरगद की जटा के अंकुर को 100
मिलीलीटर गाय के दूध में पीसकर और छानकर दिन में
3 बार स्त्री को पिलाने से रक्तप्रदर में लाभ
होता है।


*बरगद के दूध की 5-7 बूंदे बताशे में भरकर खाने से
रक्तप्रदर मिट जाता है।
*बरगद के पत्ते, सौंठ, पुरानी ईंट के पाउडर, गिलोय
तथा पुनर्नवा की जड़ का चूर्ण समान मात्रा में लेकर
पानी के साथ पीसकर लेप करने से भगन्दर के रोग में
फायदा होता है।


*20 ग्राम बरगद की छाल को 400 मिलीलीटर
पानी में पकायें, पकने पर आधा पानी रहने पर छानकर
उसमें 10-10 ग्राम गाय का घी और चीनी मिलाकर
गर्म ही खाने से कुछ ही दिनों में बादी बवासीर में
लाभ होता है।


*बरगद के 25 ग्राम कोमल पत्तों को 200 मिलीलीटर
पानी में घोटकर खूनी बवासीर के
रोगी को पिलाने से 2-3 दिन में ही खून
का बहना बंद होता है। बवासीर के मस्सों पर बरगद के
पीले पत्तों की राख को बराबर मात्रा में सरसों के
तेल में मिलाकर लेप करते रहने से कुछ ही समय में बवासीर
ठीक हो जाती है।


*बरगद की सूखी लकड़ी को जलाकर इसके
कोयलों को बारीक पीसकर सुबह-शाम 3 ग्राम
की मात्रा में ताजे पानी के साथ रोगी को देते रहने
से खूनी बवासीर में फायदा होता है। कोयलों के
पाउडर को 21 बार धोये हुए मक्खन में मिलाकर मरहम
बनाकर बवासीर के मस्सों पर लगाने से मस्से
बिना किसी दर्द के दूर हो जाते हैं।


* खून निकलता है। उसे खूनी दस्त कहते हैं। इसे रोकने के
लिए 20 ग्राम बरगद की कोपलें लेकर पीस लें और रात
को पानी में भिगोंकर सुबह छान लें फिर इसमें 100
ग्राम घी मिलाकर पकायें, पकने पर घी बचने पर 20-25
ग्राम तक घी में शहद व शक्कर मिलाकर खाने से
खूनी दस्त में लाभ होता है।


*बरगद के दूध को नाभि के छेद में भरने और उसके आसपास
लगाने से अतिसार (दस्त) में लाभ होता है। 6 ग्राम
बरगद की कोंपलों को 100 मिलीलीटर पानी में
घोटकर और छानकर उसमें थोड़ी मिश्री मिलाकर
रोगी को पिलाने से और ऊपर से मट्ठा पिलाने से
दस्त बंद हो जाते हैं।


*बरगद की छाया मे सुखाई गई 3 ग्राम छाल को लेकर
पाउड़र बना लें और दिन मे 3 बार चावलों के पानी के
साथ या ताजे पानी के साथ लेने से दस्तों में
फायदा मिलता है। बरगद की 8-10
कोंपलों को दही के साथ खाने से दस्त बंद हो जाते
हैं।


*20 ग्राम बरगद की छाल और
इसकी जटा को बारीक पीसकर बनाये गये चूर्ण
को आधा किलो पानी में पकायें, पकने पर अष्टमांश
से भी कम बचे रहने पर इसे उतारकर ठंडा होने पर छानकर
खाने से मधुमेह के रोग में लाभ होता है।


*लगभग 24 ग्राम बरगद के पेड़ की छाल लेकर जौकूट करें
और उसे आधा लीटर पानी के साथ काढ़ा बना लें।
जब चौथाई पानी शेष रह जाए तब उसे आग से उतारकर
छाने और ठंडा होने पर पीयें। रोजाना 4-5 दिन तक
सेवन से मधुमेह रोग कम हो जाता है। इसका प्रयोग
सुबह-शाम करें।


*कूठ व सेंधानमक को बरगद के दूध में मिलाकर लेप करें,
तथा ऊपर से छाल का पतला टुकड़ा बांध दें, इसे 7 दिन
तक 2 बार उपचार करने से बढ़ी हुआ गांठ दूर
हो जाती है। गठिया, चोट व मोच पर बरगद का दूध
लगाने से दर्द जल्दी कम होता है।


*बरगद के पेड़ के दूध को फोड़े पर लगाने से फोड़ा पककर
फूट जाता है।


*लगभग 5 ग्राम की मात्रा में बड़ के दूध को सुबह-सुबह
पीने से आंव का दस्त समाप्त हो जाता है।


*लगभग 3 ग्राम से 6 ग्राम बरगद की जटा का सेवन
करने से उल्टी आने का रोग दूर हो जाता है।
*30 ग्राम वट की छाल को 1 लीटर पानी में
उबालकर गरारे करने से मुंह के छाले खत्म हो जाते हैं।
*घाव में कीड़े हो गये हो, बदबू आती हो तो बरगद
की छाल के काढ़े से घाव को रोज धोने से इसके दूध
की कुछ बूंदे दिन में 3-4 बार डालने से कीड़े खत्म होकर
घाव भर जाते हैं।
*बरगद के दूध में सांप की केंचुली की राख मिलाकर
और उसमें रूई भिगोकर नासूर पर रखें। दस दिन तक
इसी प्रकार करने से नासूर में लाभ मिलता है।


*अगर घाव ऐसा हो जिसमें कि टांके लगाने की जरूरत
पड़ जाती है। तो ऐसे में घाव के मुंह को पिचकाकर
बरगद के पत्ते गर्म करके घाव पर रखकर ऊपर से कसकर
पट्टी बांधे, इससे 3 दिन में घाव भर जायेगा, ध्यान रहे
इस पट्टी को 3 दिन तक न खोलें।


*फोड़े-फुन्सियों पर इसके पत्तों को गर्मकर बांधने से वे
शीघ्र ही पककर फूट जाते हैं।
*बरगद के आधा किलो पत्तों को पीसकर, 4
किलो पानी में रात के समय भिगोकर सुबह
ही पका लें। एक किलो पानी बचने पर इसमें
आधा किलो सरसों का तेल डालकर दोबारा पकायें,
तेल बचने पर छानकर रख लें, इस तेल की मालिश करने से
गीली और खुश्क दोनों प्रकार की खुजली दूर
होती है।
*बरगद की पेड़ की टहनी या इसकी शाखाओं से
निकलने वाली जड़ की दातुन करने से दांत मजबूत होते
हैं।
*कीड़े लगे या सड़े हुए दांतों में बरगद का दूध लगाने से
कीड़े तथा पीड़ा दूर हो जाती है।
*10 ग्राम बरगद की छाल, कत्था और 2 ग्राम
कालीमिर्च इन तीनों को खूब बारीक पाउडर
बनाकर मंजन करने से दांतों का हिलना, मैल, बदबू
आदि रोग दूर होकर दांत साफ हो जाते हैं।
*दांत के दर्द पर बरगद का दूध लगाने से दर्द दूर
हो जाता है। इसके दूध में एक रूई की फुरेरी भिगोकर
दांत के छेद में रख देने से दांत की बदबू दूर होकर दांत
ठीक हो जाते हैं तथा दांत के कीड़े भी दूर हो जाते
हैं।
*अगर किसी दांत को निकालना हो तो उस दांत
पर बरगद का दूध लगाकर दांत को आसानी से
निकाला जा सकता है।


*बरगद के पेड़ की जटा से मंजन करने से दांतों के कीड़े
खत्म हो जाते हैं। बरगद की कोमल लकड़ी की दातुन से
पायरिया खत्म हो जाता है।


*बरगद का दूध दांतों में लगाने, म
सूढ़ों पर मलने से
उनका दर्द दूर हो जाता है। बरगद की छाल के काढ़े से
कुछ समय तक रोजाना गरारे करने से दांत मजबूत
हो जाते हैं।


*बरगद के पेड़ 
का दूध निकालकर दांतों लगाने से
दांतों का दर्द खत्म हो जाता है।
*बरगद की छाल को पीसकर दांतों के नीचे रखें। इससे
दांतों का दर्द खत्म हो जाता है।
*दमा के रोगी को बड़ के पत्ते जलाकर उसकी राख
240 मिलीग्राम पान में रखकर खाने से लाभ
मिलता है।


*बरगद के पत्तों पर घी चुपड़कर बांधने से सूजन दूर
हो जाती है।


*गठिया के दर्द में बरगद के दूध में अलसी का तेल
मिलाकर मालिश करने से लाभ मिलता है।