Pasha वाजीकरण
(संभोग शक्ति बढ़ाना)
.: परिचय-
यौनसुख अर्थात संभोग क्रिया के समय चरम सुख
की प्राप्ति होना बहुत ही आनंददायक
होता है। इसकी तुलना बहुत से विद्वानों ने स्वर्ग
के
सुख से की है। हर मनुष्य पूरे
जीवन
इस सुख को भोगना चाहता है। मनुष्य
कभी भी काम अर्थात सेक्स से मुक्त
नहीं होना चाहता। यही उसके
जीवन का प्राथमिक बिंदु है। काम अर्थात सेक्स
की शक्ति परमात्मा की शक्ति है
इसलिए
तो काम अर्थात सेक्स से शरीर में
ऊर्जा पैदा होती है इसलिए मनुष्य
को पूरी तरह से काम-शक्ति संपन्न होना चाहिए।
लेकिन आज के आधुनिक युग में
युवा पीढ़ी पर काम का बोझ, एक-दूसरे
से
आगे निकलने की होड़, मानसिक तनाव , विषाद, नशे
की लत, पश्चिमी सभ्यता को अपनाने
की लालसा, अप्राकृतिक मैथुन , एलोपैथिक दवाईयों के
दुष्परिणाम, खान-पान में अनिमियता बरतना, दूषित वातावरण और
बढ़ती हुई कामवासना के कारण उम्र से पहले
ही यौनशक्ति की कमी से
पीड़ित होते जा रहे हैं।
कामशक्ति की कमी से ग्रस्त
युवकों की संख्या दिन पर दिन
बढ़ती ही जा रही है।
वाजीकरण की जरूरत-
दुनिया में हर स्त्री और पुरुष सेक्स के लिए
बराबर रूप से समर्थ नहीं होते हैं और हर कोई
संतान पैदा करने में सक्षम नहीं हो पाते हैं। जैसे
कि बहुत से पुरुष शरीर से तो बहुत
ही हष्ट-पुष्ट और ताकतवर होते हैं लेकिन फिर
भी वह संभोगशक्ति में कमजोर होते हैं।
इन्हीं के विपरीत बहुत से पुरुष
दुबले-
पतले शरीर वाले होते हुए भी बहुत
तेज संभोग शक्ति वाले और स्त्री को संतुष्ट करने
वाले होते हैं। बहुत से पुरुष स्वभाव से
ही सेक्स
करने में कमजोर होते हैं और इस क्रिया में कुछ
ही देर में थक जाते हैं। लेकिन बहुत से पुरुष
संभोग
शक्ति को ज्यादा लंबे समय तक ले जाने वाले होते हैं। कुछ
पुरुष
वाजीकरण औषधियों के सेवन से संभोग क्रिया में
सफल
होते हैं तो कुछ इस क्रिया का बार-बार अभ्यास करने से इस
क्रिया को सफल बनाते हैं। बहुत से पुरुष कम
वीर्य
वाले होते हैं तो कुछ संभोग क्रिया के समय देर से उत्तेजित
होने
वाले होते हैं। ऐसे पुरुषों में काम-उत्तेजना सोई हुई अवस्था में
होती है जिसे स्त्री के नग्न
शरीर के अंगों को देखकर, चुंबन, आलिंगन, सेक्स
के
बारे में बातचीत और नग्न तसवीर
आदि के
द्वारा जागृत किया जाता है। ऐसे पुरुषों को संभोग क्रिया में तुरंत
उत्तेजित करने के लिए वाजीकरण औषधियों का सेवन
कराना जरूरी होता है।
वाजीकरण का सेवन करने के लिए
जरूरी बातें-
आयुर्वेद में बताया गया है कि कम उम्र के बच्चों और
ज्यादा उम्र के पुरुषों को वाजीकरण औषधि का सेवन
नहीं करना चाहिए। इनका सेवन लगभग 16 से 50
साल तक की उम्र के लोगों को करना चाहिए।
क्योंकि यही उम्र सेक्स करने के लिए सबसे
ज्यादा अच्छा होता है। 16 साल से कम उम्र में या 50 साल से
ज्यादा की उम्र में सेक्स करना बेकार होता है
क्योंकि बाल्यकाल (युवावस्था से पहले की उम्र) में
शरीर की धातुएं (वीर्य,
शुक्राणु) पूरी तरह से विकसित
नहीं होते हैं और अगर ऐसे में वह
स्त्री के साथ संभोग क्रिया करता है तो वह उसके
लिए व्यर्थ ही होता है और कभी-
कभी हानिकारक भी हो जाता है।
इसी तरह से 50 साल की उम्र
अर्थात वृद्धावस्था में शरीर
की सारी धातुएं (वीर्य,
शुक्राणु) कमजोर हो जाती हैं। कमजोर
शरीर वाला, कमजोर हड्डियों वाला व्यक्ति अगर
किसी स्त्री के साथ संभोग करने में लग
जाता है तो वह इसमें कुछ पाने के बजाय अपने
शरीर
का नाश करवा लेता है। रसायन औषधि के सेवन से जहां नए
यौवन
की प्राप्ति होती है
वही वाजीकरण औषधियों के सेवन से
यौनसुख मिलता है। जिस व्यक्ति का मन उसके वश में
रहता है
वह हमेशा वाजीकरण औषधि का सेवन कर
सकता है।
.: वाजीकरण द्रव्य-
दूध-
आयुर्वेद के अनुसार दूध को सबसे
ज्यादा उपयोगी वाजीकरण औषधि का नाम
दिया गया है। दूध वीर्य की वृद्धि करने
वाला, काम-शक्ति को बढ़ाने वाला और शरीर
की खोई हुई ताकत को दुबारा पैदा करने में
प्रभावशाली होता है। अगर स्त्री के
साथ
संभोग करने से पहले गर्म दूध पी लिया जाए
तो इससे
यौनशक्ति बढ़ती है, संभोग के प्रति मन में
इच्छा पैदा होती है, पूरी मात्रा में
वीर्य स्खलन होता है। वहीं अगर
संभोग करने के बाद गर्म और मीठा दूध
पीने से संभोग करने के समय खर्च हुई
शक्ति दुबारा मिलकर व्यक्ति की थकान दूर
हो जाती है। इसलिए संभोग करने के पहले और
बाद
में हमेशा दूध पीना चाहिए।
अंडा-
अंडे के अंदर वीर्य को बढ़ाने
की बहुत ज्यादा क्षमता होती है।
दूध
के अंदर अंडे की जर्दी मिलाकर
पीने से वीर्य बढ़ता है और संभोग
करने
की शक्ति भी तेज
होती है।
वैसे तो ज्यादातर लोग मुर्गी और
मोरनी के
अंडों का सेवन करते ही हैं लेकिन इनके
अलावा चिड़िया के अंडों को भी बहुत
ज्यादा वाजीकरण औषधि के रूप में गिना जाता है।
.: गोखरू-
गोखरू का फल कांटेदार होता है और औषधि के रूप में
काम आता है। बारिश के मौसम में यह हर जगह पर
पाया जाता है। नपुंसकता रोग में गोखरू के लगभग 10 ग्राम
बीजों के चूर्ण में इतने ही काले तिल
मिलाकर 250 ग्राम दूध में डालकर आग पर पका लें। पकने पर
इसके खीर की तरह गाढ़ा हो जाने पर
इसमें 25 ग्राम मिश्री का चूर्ण मिलाकर सेवन
करना चाहिए। इसका सेवन नियमित रूप से करने से नपुसंकता रोग
में
बहुत ही लाभ होता है।
इसके अलावा गोखरू का चूर्ण, आंवले का चूर्ण,
नीम और गिलोय को बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण
बना लें। इस बने हुए चूर्ण को रसायन चूर्ण कहा जाता है।
इस
चूर्ण को रोजाना 3 बार 1-1 चम्मच की मात्रा में दूध
या ताजे पानी के साथ लेने से नपुंसकता , संभोग करने
की इच्छा न करना, वीर्य
की कमी होना, प्रमेह, प्रदर और
मूत्रकृच्छ जैसे रोगों में लाभ होता है।
.: मूसली-
मूसली पूरे भारत में पाई
जाती है। यह सफेद और
काली दो प्रकार
की होती है।
काली मूसली से
ज्यादा गुणकारी
सफेद मूसली होती है। यह
वीर्य को गाढ़ा करने
वाली होती है।
मूसली के चूर्ण को लगभग 3-3 ग्राम
की मात्रा में सुबह और शाम दूध के साथ लेने से
वीर्य
की बढ़ोत्तरी होती है और
शरीर में काम-
उत्तेजना की वृद्धि होती है।
इसके अलावा मूसली के लगभग 10 ग्राम
चूर्ण को 250 ग्राम गाय के दूध में मिलाकर
अच्छी तरह से उबालकर
किसी मिट्टी के बर्तन में रख दें। इस
दूध
में रोजाना सुबह और शाम पिसी हुई
मिश्री
मिलाकर सेवन करने से लिंग का ढीलापन,
शीघ्रपतन और संभोग
क्रिया की इच्छा न
करना, वीर्य की कमी
होना आदि रोगों में बहुत लाभ मिलता है।
कौंच-
कौंच को कपिकच्छू और कैवांच आदि के नामों से
भी जाना जाता है। संभोग करने
की शक्ति को बढ़ाने के लिए इसके बीज
बहुत लाभकारी रहते हैं। इसके
बीजों का सेवन करने से वीर्य
की बढ़ोत्तरी होती है,
संभोग
करने की इच्छा तेज होती है और
शीघ्रपतन रोग में लाभ होता है। इसके
बीजों का उपयोग करने के लिए
बीजों को दूध
या पानी में उबालकर उनके ऊपर
का छिलका हटा देना चाहिए। इसके बाद
बीजों को सुखाकर बारीक चूर्ण
बना लेना चाहिए। इस चूर्ण को लगभग 5-5 ग्राम
की मात्रा में सुबह और शाम मिश्री के
साथ दूध में मिलाकर सेवन करने से लिंग का ढीलापन
और शीघ्रपतन का रोग दूर होता है।
कौंच के बीज, सफेद मूसली और
अश्वगंधा के बीजों को बराबर मात्रा में
मिश्री के साथ मिलाकर बारीक चूर्ण तैयार
कर लें। इस चूर्ण में से एक चम्मच चूर्ण सुबह और शाम
दूध
के साथ लेने से लिंग का ढीलापन,
शीघ्रपतन और वीर्य
की कमी होना जैसे रोग
जल्दी दूर हो जाते हैं।
शतावरी-
शतावरी को लेटिन भाषा में असपारगस-
रेसेमेसस कहा जाता है। इसका पौधा उत्तर भारत में
ज्यादा पाया जाता है। इसकी जड़ को औषधि के रूप
में
प्रयोग किया जाता है। शरीर में बल और
वीर्य को बढ़ाने के लिए
शतावरी की जड़ का चूर्ण लगभग 5-5
ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम गर्म दूध के
साथ
लेना लाभकारी रहता है। इसे दूध में चाय
की तरह पकाकर भी सेवन
किया जा सकता है। यह औषधि स्त्रियों के स्तनों को बढ़ाने में
लाभकारी रहती है।
शतावरी के ताजे रस को 10 ग्राम
की मात्रा में लेने से कुछ ही समय में
वीर्य बढ़ता है।
विदारीकंद-
विदारीकंद की बेल पूरे भारत में
खासकर हिमालय की निचली पहाड़ियों,
बंगाल, पंजाब, असम आदि स्थानों पर मिलती है।
इसको लेटिन भाषा में Pueraria-Tuberosa कहा जाता है।
विदारीकंद के चूर्ण को 5-5 ग्राम
की मात्रा में सुबह और शाम असमान मात्रा के
घी और शहद के साथ मिलाकर चाटने और ऊपर से
गर्म दूध पीने से पुरुष की काम-
शक्ति तेज हो जाती है। विदारीकंद बल
और वीर्य बढ़ाने वाली औषधि है।
इसके
अलावा विदारीकंद के चूर्ण में
इसी का ताजा रस मिलाकर लगभग 21 बार घोटें व
डिब्बे
में सुरक्षित रखें। इसमें से 5-5 ग्राम
की मात्रा लेकर
दिए गए तरीके से ही दूध के साथ
सेवन
करने से पुरुष का वीर्य बढ़ता है।