- प्रकृति ने कई पेड़ पौधों को औषधीय गुणों से भरपूर रखा है। इन्हीं में से एक कचनार का पेड़ भी है जो अधिकतर कंडी क्षेत्र में ही पाया जाता है। मार्च मध्य के बाद फूलों से लदने वाले इस पेड़ की पत्तियां, तना व फूल आदि सभी उपयोगी हैं। कचनार की गणना सुंदर व उपयोगी वृक्षों में होती है। इसकी अनेक प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से गुलाबी कचनार का सबसे ज्यादा महत्त्व है। कचनार के फूलों की कली लंबी, हरी व गुलाबी रंगत लिए हुए होती है। आयुर्वेद में इस वृक्ष को चामत्कारिक और औषधीय गुणों से भरपूर बताया गया है। कचनार के फूल और कलियां वात रोग, जोड़ों के दर्द के लिए विशेष लाभकारी हैं। इसकी कलियों की सब्जी व फूलों का रायता खाने में स्वादिष्ट और रक्त पित्त, फोड़े, फुंसियों को शांत करता है।
- कचनार का फूल कितना खूबसूरत होता है ,देखते ही बस जी मचल जाता है और ये है भी बहुत उपयोगी | अगर पूरा देश जान जाए की ये किस रोग की दवा है तो बस ये समझ लीजिये की बेचारा दुर्लभ फूल की श्रेणी में आ जाएगा , हो सकता है की तब सरकार को इसे प्रतिबंधित फूल घोषित करना पड़े |
- आयुर्वेदिक औषधियों में ज्यादातर कचनार की छाल का ही उपयोग किया जाता है. इसका उपयोग शरीर के किसी भी भाग में ग्रंथि (गांठ) को गलाने के लिए किया जाता है. इसके अलावा रक्त विकार व त्वचा रोग जैसे- दाद, खाज-खुजली, एक्जीमा, फोड़े-फुंसी आदि के लिए भी कचनार की छाल का उपयोग किया जाता है |
- इसके कई नाम मिलते हैं. संस्कृत- काश्चनार, हिन्दी- कचनार, मराठी- कोरल, कांचन, गुजराती- चम्पाकांटी, बंगला- कांचन, तेलुगू- देवकांचनमु, तमिल- मन्दारे, कन्नड़- केंयुमन्दार, मलयालम- मन्दारम्, पंजाबी- कुलाड़, कोल- जुरजु, बुज, बुरंग, सन्थाली- झिंजिर, इंग्लिश- माउंटेन एबोनी, लैटिन- बोहिनिआ वेरिएगेटा।
- मात्रा : इसके छाल का चूर्ण 3 से 6 ग्राम की मात्रा में प्रयोग किया जाता है, इसके फूलों का रस 10 से 20 मिलीलीटर की मात्रा में प्रयोग किया जाता है और छाल का काढ़ा 40 से 80 मिलीलीटर की मात्रा में प्रयोग किया जाता है।कचनार की छाल का महीन पिसा-छना चूर्ण 3 से 6 ग्राम (आधा से एक चम्मच) ठंडे पानी के साथ सुबह-शाम लें। इसका काढ़ा बनाकर भी सुबह-शाम 4-4 चम्मच मात्रा में (ठंडा करके) एक चम्मच शहद मिलाकर ले सकते हैं।
- कचनार के पेड़ की छाल को आग में जलाकर उसकी राख को बारीक पीसकर मंजन बना लें। इस मंजन से सुबह एवं रात को खाना खाने के बाद मंजन करने से दांतों का दर्द तथा मसूढ़ों से खून का निकलना बंद होता है।
- कचनार की छाल को जलाकर उसके राख को पीसकर मंजन बना लें। इससे मंजन करने से दांत का दर्द और मसूड़ों से खून का निकलना बंद होता है।
- कचनार के फूलों को चीनी के साथ घोटकर शर्बत की तरह बनाकर सुबह-शाम पीने से कब्ज दूर होती है और मल साफ होता है।
- कचनार के फूलों का गुलकन्द रात में सोने से पहले 2 चम्मच की मात्रा में कुछ दिनों तक सेवन करने से कब्ज दूर होती है।
पेशाब के साथ खून आना-कचनार के फूलों का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से पेशाब में खून का आना बंद होता है। इसके सेवन से रक्त प्रदर एवं रक्तस्राव आदि भी ठीक होता है। 16.बवासीर (अर्श)-
- कचनार की छाल का चूर्ण बना लें और यह चूर्ण 3 ग्राम की मात्रा में एक गिलास छाछ के साथ लें। इसका सेवन प्रतिदिन सुबह-शाम करने से बवासीर एवं खूनी बवासीर में बेहद लाभ मिलता है।
- कचनार का चूर्ण 5 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह पानी के साथ खाने से बवासीर ठीक होता है।
- कचनार के फूलों का चूर्ण बनाकर, 1 से 2 ग्राम चूर्ण सुबह-शाम चटाने से रक्त पित्त का रोग ठीक होता है। कचनार का साग खाने से भी रक्त पित्त में आराम मिलता है।
- यदि मुंह से खून आता हो तो कचनार के पत्तों का रस 6 ग्राम की मात्रा में पीएं। इसके सेवन से मुंह से खून का आना बंद हो जाता है।
- कचनार के सूखे फूलों का चूर्ण बनाकर लें और यह चूर्ण एक चम्मच की मात्रा में शहद के साथ दिन में 3 बार सेवन करें। इसके सेवन से रक्तपित्त में लाभ होता है। इसके फूलों की सब्जी बनाकर खाने से भी खून का विकार (खून की खराबी) दूर होता है।
अगर कुबड़ापन का रोग बच्चों में हो तो उसके पीठ के नीचे कचनार का फूल बिछाकर सुलाने से कुबड़ापन दूर होता है।
लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग कचनार और गुग्गुल को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से कुबड़ापन दूर होता है।
कुबड़ापन के दूर करने के लिए कचनार का काढ़ा बनाकर सेवन करना चाहिए। 20.घाव- कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से घाव ठीक होता है। इसके काढ़े से घाव को धोना भी चाहिए। 21.स्तनों की गांठ (रसूली)- कचनार की छाल को पीसकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण लगभग आधे ग्राम की मात्रा में सौंठ और चावल के पानी (धोवन) के साथ मिलाकर पीने और स्तनों पर लेप करने से गांठ ठीक होती है। 22.उपंदश (गर्मी का रोग या सिफिलिस)- कचनार की छाल, इन्द्रायण की जड़, बबूल की फली, छोटी कटेरी के जड़ व पत्ते और पुराना गुड़ 125 ग्राम। इन सभी को 2.80 किलोग्राम पानी में मिलाकर मिट्टी के बर्तन में पकाएं और यह पकते-पकते जब थोड़ा सा बचे तो इसे उतारकर छान लें। अब इसे एक बोतल में बंद करके रख लें और सुबह-शाम सेवन करें। 23.सिर का फोड़ा- कचनार की छाल, वरना की जड़ और सौंठ को मिलाकर काढ़ा बना लें। यह काढ़ा लगभग 20 से 40 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम पीना चाहिए। इसके सेवन से फोड़ा पक जाता है और ठीक हो जाता है। इसके काढ़े को फोड़े पर लगाने से भी लाभ होता है। 24.चेचक (मसूरिका)- कचनार की छाल के काढ़ा बनाकर उसमें सोने की राख डालकर सुबह-शाम रोगी को पिलाने से लाभ होता है। 25.गले की गांठ- कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर, इसके 20 ग्राम काढ़े में सोंठ मिलाकर सुबह-शाम पीने से गले की गांठ ठीक होती है। 26.गलकोष प्रदाह (गलकोष की सूजन)- खैर (कत्था) के फल, दाड़िम पुष्प और कचनार की छाल। इन तीनों को मिलाकर काढ़ा बना लें और इससे सुबह-शाम गरारा करने से गले की सूजन मिटती है। सिनुआर के सूखे पत्ते को धूम्रपान की तरह प्रयोग करने से भी रोग में आराम मिलता है। 27.गला बैठना-कचनार मुंह में रखकर चबाने या चूसने से गला साफ होता है। इसको चबाने से आवाज मधुर (मीठी) होती है और यह गाना गाने वाले व्यक्ति के लिए विशेष रूप से लाभकारी है। 28.थायराइड-कचनार के फूल थायराइड की सबसे अच्छी दवा हैं।लिवर में कोई तकलीफ हो तो कचनार की जड़ का काढ़ा पिएं। सावधानी : कचनार देर से हजम होती है और कब्ज पैदा करती है।